” धर्मघ्नानां वृथा जन्म लुब्धानां पापिनां तथा ।
वृथा पाकं च येश्यन्ति परदाररताश्च ये ।।
पाकभेदकरा ये च ये च स्युः सत्यवर्जिताः ।। ”
जो धर्म का नाश करने वाले – लोभी – पापी – बलिवैश्वदेव किये बिना भोजन करने वाले – परस्त्रीगामी – भोजन में भेद करने वाले और असत्यभाषी हैं – उनका जन्म वृथा है ।
” मृष्टमश्नाति यश्चैकः क्लिश्यमानैस्तु बान्धवैः ।
पितरं मातरं चैव उपाध्यायं गुरं तथा ।।
मातुलं मातुलानीं च यो निहन्याच्छपेत वा ।
ब्राह्मणश्चैव यो भूत्वा संध्योपासनवर्जितः ।।
निःस्वाहो निःस्वधश्चैव शूद्राणामन्नभुग् द्विजः।
मम वा शंकरस्याथ ब्रह्मणो वा युधिष्ठिर ।।
अथवा ब्राह्मणानां तु ये न भक्ता नराधमाः ।
वृथा जन्मान्यथैषां पापिनां विद्धि पाण्डव ।। ”
#पाण्डुनन्दन_युधिष्ठिर ! जो बन्धु – बान्धवों को क्लेश देकर अकेले ही मिठाई खाने वाला है — जो माता – पिता — अध्यापक — गुरू और मामा – मामी को मारते या गाली देते हैं — जो ब्राह्मण होकर सन्ध्योपासन से रहित हैं — जो अग्निहोत्र का त्याग करने वाले हैं — जो श्राद्ध – तर्पण से दूर रहने वाले हैं — जो ब्राह्मण होकर शूद्र का अन्न खाते हैं तथा जो मेरे ( श्रीकृष्ण ) — शंकर जी के — ब्रह्मा जी के अथवा ब्राह्मणों के भक्त नहीं हैं — ये चौदह प्रकार के मनुष्य अधम होते हैं — इन्हीं पापियों के जन्म को व्यर्थ समझना चाहिए ।
❗️ #इन_का_भी_जन्म_निरर्थक_है ❗️
” हेतुशास्त्रेषु ये सक्ताः कुदृष्टिपथमाश्रिताः।
देवान् निन्दत्यनाचारा वृथा जीवन्ति ते नराः।।
जिनकी कोरे तर्कशास्त्र में ही आसक्ति है — जो नास्तिक पथ का अवलम्बन करते हैं — जिन्होनें आचार त्याग दिया है तथा जो देवताओं की निन्दा करते हैं– वे मनुष्य व्यर्थ ही जी रहे हैं ।
” कुशलैः कृतशास्त्राणि पठित्वा ये नराधमाः ।
विप्रान् निन्दन्ति यज्ञांश्च वृथा जीवन्ति ते नराः।।
जो नराधम नास्तिकों के शास्त्र पढकर ब्राह्मण और यज्ञों की निन्दा करते हैं वे व्यर्थ ही जीवन धारण करते हैं ।
” ये दुर्गां वा कुमारं वा वायुमग्निं जलं रविम् ।
पितरं मातरं चैव गुरूमिन्द्रं निशाकरम् ।।
मूढा निन्दन्त्यानाचारा वृथा जीवन्ति ते नराः।। ”
जो मूढ दुर्गा – स्वामी कार्तिकेय – वायु – अग्नि – जल – सूर्य – माता – पिता – गुरू – इन्द्र तथा चन्द्रमा की निन्दा करते हैं वे मनुष्य भी निरर्थक ही जीवन व्यतीत करते हैं ।
रिपोर्ट – जगदीश शुक्ला







