गंगा किनारे हवन करना आध्यात्मिक और मानसिक शांति के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार, किसी भी पवित्र तीर्थस्थल या गंगातट पर किए गए हवन का फल सामान्य स्थान की तुलना में करोड़ों गुना अधिक प्राप्त होता है। सनातन धर्म में गंगा को देव नदी माना गया है।
गंगा किनारे बैठकर आहुति देने से वातावरण अत्यंत शुद्ध हो जाता है और साधक के शारीरिक एवं मानसिक पापों का नाश होता है। वेदों और पुराणों (जैसे स्कंद पुराण) के अनुसार, गंगा के तट पर किए गए जप, तप, दान और हवन का फल अनंत गुना होता है। यदि हवन का उद्देश्य पितरों की शांति या तर्पण है, तो गंगा किनारे किया गया हवन सीधा पितरों को मोक्ष प्रदान करने वाला माना जाता है।

बहती हुई गंगा और हवन की पवित्र अग्नि (अग्निकर्म) मिलकर वातावरण में उच्च कोटि की सकारात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं, जो ध्यान और साधना के लिए सर्वोत्तम है। पर्यावरण संरक्षण में हवन (यज्ञ) की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका होती है। वैज्ञानिक मान्यताओं और वैदिक परंपरा के अनुसार,
हवन सामग्री, घी और औषधीय जड़ी-बूटियों को अग्नि में जलाने से उत्पन्न धुआं एक प्राकृतिक वायु शोधक के रूप में कार्य करता है। यह वातावरण में मौजूद हानिकारक बैक्टीरिया और सूक्ष्मजीवों को नष्ट करके पर्यावरण को शुद्ध करता है।
काशी के प्राचीन दशाश्वमेध घाट पर गंगोत्री सेवा समिति के तत्वाधान में मां गंगा की आरती के अर्चकों के साथ पर्यावरण संरक्षण व मानसिक शांति हेतु किया गया हवन सदैव शुभ फलदाई है ।







