चन्दौली सैदूपुर निजी विद्यालयों की कार्यप्रणाली को लेकर अभिभावकों में भारी नाराज़गी देखने को मिल रही है। फीस में लगातार वृद्धि, ड्रेस और किताबों के नाम पर बढ़ता खर्च तथा हर साल बदलते पाठ्यक्रम ने आम परिवारों की आर्थिक स्थिति पर गंभीर असर डाला है। लगातार मिल रही शिकायतों ने शिक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
हर साल बदल रहा पाठ्यक्रम, बढ़ रहा आर्थिक बोझ
अभिभावकों का आरोप है कि कई निजी स्कूल कक्षा 1 से 8 तक हर वर्ष किताबें बदल देते हैं। इससे पिछले सत्र की किताबें पूरी तरह बेकार हो जाती हैं और अभिभावकों को हर साल नई किताबें खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ता है। उनका कहना है कि यह प्रक्रिया बच्चों की पढ़ाई से ज्यादा आर्थिक बोझ बढ़ाने वाली बन गई है।
यूनिफॉर्म में ‘फिक्स दुकान’ का खेल
कई विद्यालयों पर यह भी आरोप लग रहे हैं कि वे यूनिफॉर्म केवल निर्धारित दुकानों से ही खरीदने के लिए अभिभावकों पर दबाव बनाते हैं। इससे कीमतों में पारदर्शिता नहीं रहती और कमीशनखोरी की आशंका बढ़ जाती है। अभिभावकों के अनुसार यह सीधा आर्थिक शोषण है।
फीस वृद्धि और री-एडमिशन शुल्क से बढ़ी परेशानी
हर साल फीस बढ़ाने के साथ-साथ री-एडमिशन के नाम पर अतिरिक्त शुल्क वसूला जा रहा है। अभिभावकों का कहना है कि यह नियमों के खिलाफ है और इससे मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए बच्चों की पढ़ाई जारी रखना कठिन होता जा रहा है।
नियमों की अनदेखी या प्रशासनिक ढिलाई?
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि निजी स्कूलों की फीस और अन्य शुल्कों को लेकर सख्त नियमन और पारदर्शिता बेहद जरूरी है। उनका कहना है कि यदि समय रहते इस पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो यह समस्या और गंभीर रूप ले सकती है।
अभिभावकों की मांग: सख्त कार्रवाई और पारदर्शिता
अभिभावकों ने प्रशासन से मांग की है कि निजी स्कूलों की मनमानी पर रोक लगाई जाए, फीस संरचना को नियंत्रित किया जाए और ड्रेस व किताबों की खरीद में स्वतंत्रता सुनिश्चित की जाए।
अब बड़ा सवाल यही है कि प्रशासन कब सक्रिय होगा और अभिभावकों को इस बढ़ते आर्थिक बोझ से राहत कब मिलेगी?
रिपोर्ट – अलीम हाशमी







