विंध्याचल धाम, मिर्जापुर
महर्षि वेद विज्ञान विद्यापीठ, विंध्याचल धाम में गुरु पूर्णिमा का पर्व अति उत्साह और हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। आश्रम परिसर में 255 वैदिक छात्रों, प्रभारी आचार्यों और कर्मचारियों ने सामूहिक रूप से गुरु पूजन किया।
कार्यक्रम का शुभारंभ चारों वेदों के मंगलाचरण, स्वस्ति वाचन और शांति पाठ से हुआ। इसके पश्चात गुरु महिमा पर आधारित भजन-कीर्तन का आयोजन किया गया। छात्रों ने रामायण, श्रीमद्भगवद्गीता, दुर्गा सप्तशती और श्रीमद्भागवत के श्लोकों की अंताक्षरी और विभिन्न खेलकूद प्रतियोगिताओं के माध्यम से पर्व को उल्लासपूर्वक मनाया।
इस अवसर पर आश्रम प्रभारी राज किशोर शर्मा ने कहा कि यह पर्व केवल अपने गुरु का सम्मान करने का पर्व नहीं है, बल्कि उन महान ऋषियों और आचार्यों को स्मरण करने का अवसर भी है, जिन्होंने मानवता को आध्यात्मिक ज्ञान का मार्ग दिखाया है। भारतीय संस्कृति में गुरु को भगवान से भी ऊँचा स्थान दिया गया है। गुरु ही अज्ञान के अंधकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश फैलाते हैं।

उन्होंने कहा कि गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है। इसी दिन महर्षि कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास का जन्म हुआ था, जिन्होंने चारों वेदों का विभाजन किया और महाभारत सहित 18 पुराणों की रचना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। शैव परंपरा के अनुसार भगवान शिव ही आदि गुरु हैं, जिन्होंने सप्तऋषियों को योग और आत्मज्ञान का उपदेश दिया।
यही ज्ञान परंपरा ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती से परम पूज्य महर्षि महेश योगी को प्राप्त हुई और महर्षि जी ने योग और भावातीत ध्यान का परचम पूरे विश्व में फहराया।

शर्मा ने कहा कि महर्षि के कृपापात्र शिष्य एवं महर्षि संस्थानों के अध्यक्ष वेद विद्या मार्तण्ड ब्रह्मचारी गिरीश जी महर्षि जी के संकल्पों को पूर्ण करने और शिक्षा प्रणाली को बेहतर बनाने के लिए सतत प्रयासरत हैं। उनके नेतृत्व में सनातन संस्कृति, वैदिक शिक्षा, यज्ञ-अनुष्ठान और भावातीत ध्यान के माध्यम से दुःख-विहीन समाज और रामराज्य की स्थापना का कार्य अनवरत चल रहा है।
महर्षि और ब्रह्मचारी गिरीश की गुरु-शिष्य जोड़ी इतिहास में अनुपम है, जो हम सभी के लिए प्रेरणादायक है। अंत में सभी ने ‘जय गुरुदेव, जय महर्षि’ के जयघोष के साथ कार्यक्रम का समापन किया।







