एक बात तो स्पष्ट हो रही है कि आन्दोलन अपने मार्ग से भटक रहा है अथवा भटक गया है क्योंकि नीट के नाम पर प्रारम्भ हुआ आन्दोलन आश्चर्यजनक रूप से राष्ट्र, राष्ट्र के प्रतिमान, जाति-सम्प्रदाय, बहुसंख्यक समाज और उनकी आस्थाओं के विरोध में* परिणत हो गया। भारत को नेपाल बनाने की, संसद-भवन को उखाड़ने की घोषणाएँ होने लगीं। इन विनाशकारी एवं अनुत्पादक कार्यों के सम्पादन हेतु उपयोग में लिया गया भविष्य के भारतनिर्माता युवाओं को, उनकी समस्याओं को और प्रयोजन सिद्ध किया चतुर राजनीतिपण्डितों ने अपना और अपने दलों का। आन्दोलन के केन्द्र में अधिष्ठित निरागस पर प्रत्ययनेय युवा समझ ही नहीं पाया कि कब वह निरुपयोगी होकर आन्दोलन बाह्य हो गया।
आहत हुए निरागस युवा और सड़कों पर ताण्डव किया आयातित उपद्रवतज्ञ युवाओं ने, जिनका शिक्षा से कोई सरोकार नहीं है और न था। वंचकों की वंचना से वंचित युवा समाज विवेकच्युत हो गया, उचितानुचित का भान उसे न रहा। अब ऐसे में ताण्डव की प्रेरणा देनेवाले आपके कृत्य को जायज़ कहते हैं क्योंकि उन्हें आपको उपयोग में लेना है और मैं इसे अनुशासन हीनता कहता हूँ -॥ हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः ॥
ऐसे वचन जो कल्याणकारी भी हों और मन को अच्छे भी लगें, संसार में दुर्लभ हैं।
यदि भावनाएँ आहत होती हैं तो मुझ अज्ञानी को क्षमा करना।







