तू कौन, चल हट रास्ते से! : विष्णु नागर;

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सूत्रों के अनुसार साहेब की हालत आजकल बहुत टाइट चल रही है। बहुत दुखी-दुखी से, उदास-उदास से, घबराए-घबराए से तनावग्रस्त रहते हैं। इस हालत में कहीं भी, कुछ भी बोलकर अपनी घबराहट जाहिर करते हैं। कहते हैं कि मुझे कुछ लोग बदनाम करना चाहते हैं। देश में अराजकता फैलाना चाहते हैं। देश के टुकड़े-टुकड़े करना चाहते हैं। उनके नाम नहीं बताते कि वे दुष्ट कौन हैं! नाम बताएंगे तो इनकी हेठी हो जाएगी, पर सब जानते हैं कि इनके निशाने पर आजकल कौन है? कौन है, जिसने इन्हें इतना परेशान कर रखा है।

 

वे नहीं बताते, तो हम भी नहीं बताते। हम भी इशारे-इशारे में कह रहे हैं, ये लोग नहीं, दरअसल एक अकेला नेता है, जिसका फोबिया इन्हें दिन-रात कुतर-कुतर कर खाये जा रहा है।

बताइए, ये कह रहे हैं कि इन्हें बदनाम किया जा रहा है, जैसे दुनिया भर में इनका बड़ा सुनाम है और इनकी सरकार अराजकता नहीं, सुराजकता ला रही है। ऐसी अराजकता तो कभी थी नहीं माननीय, जैसी आपके राज में है। आपके मंत्री, आपके मुख्यमंत्रियों की भाषा खुलेआम गुंडागर्दी की भाषा है और उनके काम भी इसी के अनुरूप हैं। आपके गृहमंत्री को इतनी भी तमीज नहीं कि विपक्ष के नेता का नाम सही ढंग से ले सके। उन्हें ‘राहुल बाबा’ कहते हैं। आप और आपकी सरकार को इंडिया गठबंधन से इतनी तकलीफ़ है कि उसे ‘इंडी गठबंधन’ कहते हो। गली-गली में जिनके गुंडों की फौज खड़ी कर रखी है, वे कह रहे हैं कि मेरा नाम बदनाम किया जा रहा है। देश को तोड़ा जा रहा है, जैसे ये तो बेचारे पिछले बारह साल से इसे जोड़ने में लगे थे!

पर खैर वे प्रधानमंत्री हैं, जो भी बोलेंगे, शान से छपेगा, शान से गोदी चैनलों पर नमूदार होगा, इसलिए कुछ भी बोलते चले जाओ। वैसे भी अभी उनके पिताजी का राज चल रहा है।

साहेब पिछले कुछ महीनों से विपक्ष से कुछ ज्यादा ही खौफ खाने लगे हैं। राहुल गांधी का तो उन्हें फोबिया-सा है। भारत के परमाणु कार्यक्रम से लेकर कृषि तक पर जब भी बात करते हैं, तो भी वे छद्म रूप से राहुल-राहुल करते पाए जाते हैं।

आज रामलीला मैदान में इंडिया गठबंधन की रैली है, इससे वे सुबह चार बजे से ही घबराए हुए हैं। कुछ जो उनसे रैली से ठीक पहले मिलकर आए हैं, बता रहे हैं कि साहेब बिना ठंड के भी ऊनी वस्त्रों में थर-थर कांप रहे हैं। कंबल ओढ़कर चार-चार हीटर लगाकर बैठे हैं, फिर भी उनके दांत किटकिटा रहे हैं। उन्हें जाने क्यों लग रहा है कि यह रैली नहीं, समुद्र के पानी का रेला है, जो उन्हें डुबो देगा।

वे आज सुबह सात बजे से टीवी के सामने बैठे हैं और गिन रहे हैं कि अभी तक कितने लोग रामलीला मैदान में आ चुके हैं। हर तीन सेकंड बाद वे उधर नजर घुमाते हैं। 60 सेकंड बीतते न बीतते उन्हें लगता है कि अब तो इतने लोग आ गए हैं कि वे गिन नहीं सकते। डर कर कहते हैं कि ऐ साला नौकर, तुम टीवी बंद करो। सब बकवास है। बदमाशी है। मुझे हटाने की साजिश है। बंगले में बैठे-बैठे चुनौती दे रहे हैं कि ओ, अरे इंडीवालों, मैं कहीं नहीं जा रहा। उनके सेवक मन ही मन हंस रहे हैं कि साहेब की हालत काफी गड़बड़ है। लगता है, नरभसा गए हैं। इन्हें इलाज की जरूरत है।

तीन मिनट भी नहीं बीतते कि साहब फिर से कहते हैं टीवी चालू करो! फिर कहते हैं, बंद करो। फिर चालू, फिर बंद, यह कोई पचास बार करवा चुके हैं। उनका डाक्टर उनका ब्लडप्रेशर बार-बार नाप रहा है और कह रहा है कि सर, आप उधर देखना बंद कीजिए। टीवी बंद कीजिए। इतना लोड मत लीजिए, वरना ब्लडप्रेशर खतरनाक स्तर तक पहुंच जाएगा और आपको अस्पताल में भर्ती करना पड़ेगा। आपके हैल्थ कार्ड में काला धब्बा जुड़ जाएगा। प्लीज़। आपकी बदनामी होगी। मगर साहेब तो साहेब ठहरे, किसी की मानते नहीं, इसीलिए तो वे साहेब कहे जाते हैं!

उन्होंने आज अपने पास अमित शाह को बुलाया था कि आज रैली तक तुम मेरे साथ रहना। तुम रहोगे, तो मेरी घबराहट कम होगी। मगर शाह ने कहा कि सारी, मैं खुद घबराया हुआ हूं।मेरा करियर भी दांव पर लगा है। मुझे आज रैली की मानिटरिंग करने से फुर्सत नहीं है। यह शांतिपूर्ण ढंग से निबट गई, तो मेरी बहुत बदनामी हो जाएगी कि मुझे एक रैली भी हैंडल करना नहीं आता। बाद में शाम को मैं आराम से आऊंगा। साहेब ने कहा कि तब तक तो मेरे प्राण निकल जाएंगे। अमित शाह ने कहा कि यह मोदी की नहीं, शाह की गारंटी है कि आपके प्राण इतनी आसानी से नहीं निकलने वाले। जब भी निकलेंगे, मुश्किल से निकलेंगे।

कहा जाता है कि साहेब सब कुछ सहन कर सकते हैं, मगर अपनी गद्दी को चुनौती देना नहीं, जबकि अभी तो कोई उनकी गद्दी सीधे-सीधे छीन भी नहीं रहा है। अभी तो ज्ञानेश कुमार का नंबर आया है। ज्ञानेश जब भी जाएंगे, उसके बाद अमित शाह का नंबर आएगा। अभी तो ज्ञानेश के जाने में ही समय लगेगा। ऐसा तो है नहीं कि विपक्ष ने कहा, राहुल गांधी ने कहा और ज्ञानेश से कह दिया जाएगा कि भाई साहब बहुत हो चुका, बहुत सह चुके हम, अब आप कृपापूर्वक पधार जाइए। विपक्ष की रैली आज जबर्दस्त हुई है। प्लीज़ गो एंड रिजाइन!

अरे मोदी जी, जब आप लोग ज्ञानेश कुमार के लिए अभी इतनी फाइट दे रहे हो, तो सोचो, अमित शाह के लिए कितनी दोगे? जान लड़ा दोगे! क्योंकि शाहजी गए तो दाग देहलवी का यह मशहूर शेर सब को याद आने लगेगा — ‘अब हम भी जानेवाले हैं, सामान तो गया’!

वैसे शाह जी गए, तो फिर बचा क्या? सामान‌ तो गया। फकीर का झोला तो सफ़र पे गया। अब ये अलग बात है कि ज्ञानेश कुमार के लिए फाइट देते-देते ही ये इतने थक जाएं कि इसी में इनके प्राण स्वाहा हो जाएं और ये अमित शाह के लिए फाइट न दे पाएं! सरेंडर कर जाएं! नरेन्दर सरेंडर हो जाए!

फिर तो पक्का है कि साहेब का नंबर है। मगर अभी से मत डरो साहेब। कांपो मत आज से, अभी तो मौसम और भी बिगड़ेगा। हो सकता है, इस सबमें एक साल निकल जाए। खुशफहमी में रहने के लिए फिलहाल मान लो कि आप अभी एक साल तक इस पद पर हो। वर्स्ट कम वर्स्ट छह महीने रहोगे, मगर पाज़िटिव रहोगे तो बने रहोगे, वरना जल्दी चले जाओगे। बी पाजिटिव। शुभ-शुभ सोचो।

आज मैं आपकी पाजिटिविज्म की क्लास लेकर ही छोड़ूंगा। अच्छा चलो, एक साल नहीं, छह महीने रहोगे और मान लो कि दो महीने बाद ही आपकी विदाई हो गई, तो भी चिंता क्या? भूतपूर्व होने के बाद मनमोहन सिंह दस साल से अधिक समय तक जिंदा रहे। देवगौड़ा साहब तो प्रधानमंत्री रहने के तीस साल बाद भी 93 वर्ष की उम्र में आपकी सरकार को‌ समर्थन देने का महान कार्य संपन्न कर रहे हैं। विश्वनाथ प्रताप सिंह, चंद्रशेखर, इंद्रकुमार गुजराल आदि का भी पद चला गया, मगर इस वजह से तो उनका हार्टफेल नहीं हुआ। तो आप भी सेफली मान सकते हो कि आपका पद चला गया, तो भी आपका हार्ट फेल नहीं होगा। तो फिर समस्या क्या है? अरे जब आप 97 की उम्र तक प्रधानमंत्री बने रहने का प्लान बना चुके हो, तो फिर डरते क्यों हो? वीर तुम बढ़े चलो। आग में जलते चलो!

आपकी यह बात सही है कि आपका केस बहुत कांप्लिकेटेड है। पद पर न रहने के बाद हो सकता है कि आपकी स्थिति ब्राजील के पूर्व राष्ट्रपति जेयर बोल्सोनारो या उनके बेटे फ्लावियो बोल्सोनारो की तरह हो जाए! अगर ऐसी स्थिति आई तो आपके सारे चम्मच, गिलास और कटोरियां किसी काम नहीं आएंगी। उन्हें अपनी फिक्र होगी कि हमारा क्या होगा? अब कालिये मगर अंबानी नहीं तो, अडानी को तो आपकी मदद के लिए आना चाहिए, जिसे आपने पूरा देश सौंप रखा है कि जा जो चाहे, जहां चाहे, जेब में रख ले। सब अपना ही माल समझ। एक रुपया दे और ले जा! आपने इतना दिया, इतना दिया उसे कि बताते हैं कि कोई एक लाख रुपए रोज भी कमाए और उसमें से एक पैसा भी खर्च न करे, तो भी उसे अडानी बनने में एक लाख सतहत्तर हजार साल लगेंगे, मतलब अगली एक हजार पीढ़ियों तक वह अडानी नहीं बन पाएगा!

आपने उसके लिए जंगल के जंगल कटवा दिए। पानी लुटवा दिया। हवा बदबूदार बनवा दी। किसानों, आदिवासियों को उजाड़ दिया। उनके विरोध की परवाह नहीं की। उन्हें कुचल दिया, मसल दिया, निगल लिया। उसे हवाई अड्डे, बंदरगाह, सड़क और क्या-क्या नहीं दे दिया और उससे आपके रिश्तों पर डाक्यूमेंट्री बनी, तो उसे भी आपने प्रतिबंधित करवा दिया।लोग तो अब कहने लगे हैं कि सरकार साहेब चला रहे हैं या अडानी! प्रधानमंत्री का नाम क्या अब गौतम अडानी हो गया है?

तो भगवान से प्रार्थना करो कि अंत में अडानी आपको बचाने आए। उसके सामने अगर अपनी संपत्ति और साहेब में से किसी एक को बचाने का विकल्प होगा, तो साहेब वह अपनी संपत्ति के लिए आपकी बलि खुशी-खुशी दे‌ देगा। वह बड़ा बनिया है। वह आपके जब तक अच्छे दिन रहेंगे, तब तक आपके साथ रहेगा! आपको निचोड़कर कहेगा, तू कौन? मोदी कौन? मैं किसी मोदी-फोदी को नहीं जानता। चल हट रास्ते से, हट न!

(कई पुरस्कारों से सम्मानित विष्णु नागर साहित्यकार और स्वतंत्र पत्रकार हैं। जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं।)
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2. गृह मंत्री को भी लोकतंत्र बचाने दो यारो! : राजेंद्र शर्मा

भाई! मोदी जी के विरोधी इस हद तक चले जाएंगे, यह तो किसी ने नहीं सोचा था। दुनिया के सबसे ज्यादा आबादी वाले देश के गृह मंत्री, एक सौ चालीस करोड़ भारतीयों के चुने हुए पीएम के परम विश्वासपात्र, देश के अघोषित नंबर-टू, शाह साहेब सड़कों पर पैदल चल रहे हैं और वह भी हैदराबाद की ऊबड़-खाबड़ सड़कों पर। और इस पर शर्मिंदा होने बजाय इसके लिए सिर्फ शाह साहेब से ही नहीं, बल्कि देश भर से, बल्कि दुनिया भर से माफी मांगने के बजाय विपक्ष वाले उनके पैदल चलने का ही मजाक उड़ा रहे हैं।

अब इन मोदी-विरोधियों से इस पर ईमानदारी से चिंतन करने की उम्मीद तो कोई नहीं करता है कि आखिर, विवेकानंद 2.0 के अमेरिका के व्याख्यानों के ऐलान के अनुसार, जिस भारत की नियति दिशाहारा विश्व को दिशा देने की है, उसके नंबर-टू को महंगी से महंगी गाड़ियों का अपना लंबा काफिला छोड़कर, सड़क पर क्यों उतरना पड़ा है, सड़कों की खाक क्यों छाननी पड़ रही है!

फिर भी विरोधी भी कम से कम शिष्टाचार दिखाने को, शाह साहेब की तबीयत को लेकर चिंता तो जता ही सकते थे। एक फोन करके झूठे को इतना तो पूछ ही सकते थे कि सब ठीक तो है!

पर चाणक्य 2.0 के स्वास्थ्य की चिंता करना तो दूर, विरोधी तो शाह साहेब के पैदल चलने का ही मजाक उड़ा रहे हैं। कोई उनकी चाल को लुढ़कते-पुढ़कते नजर आना बता रहा है, तो कोई उनके तिरंगा लेकर जुलूस में आगे-आगे चलने के पूरे दृश्य को ही, इसलिए भी एंटरटेनिंग बता रहा है कि जुलूस में उनके पास इकलौता तिरंगा था, बाकी ओर से छोर तक उनकी पार्टी के दोरंगे थे।

किसी-किसी ने तो शाह साहेब की पदयात्रा को पूरी मनोरंजक साउथ इंडियन फिल्म ही बता दिया है। और यह तब है, जबकि शाह साहेब के इस तरह पैदल-पैदल भटकने के लिए, विपक्षी ही जिम्मेदार हैं। अगर विपक्षी वोट चोरी-वोट चोरी का शोर नहीं मचाते, इस्तीफे के लिए ज्ञानेश कुमार के पीछे नहीं पड़ जाते, लोकतंत्र बचाने की हुंकारें नहीं भरने लगते या कम से कम रामलीला मैदान में इतनी बड़ी रैली नहीं करते, तो शाह साहेब को क्या पागल कुत्ते ने काटा था, जो हैदराबाद से पदयात्राओं का सिलसिला शुरू करते।

विपक्ष वालों ने लोकतंत्र बचाने का झंडा उठाया है, इसीलिए तो शाह साहेब की पार्टी को भी लोकतंत्र बचाना याद आया है।जंतर-मंतर से लेकर कनॉट प्लेस तक जेन ज़ी ने पिटते-पिटाते और जेल की ओर मार्च करते हुए कंधे पर तिरंगा लहराया है, इसीलिए तो शाह साहेब ने भी शायद पहली बार तिरंगा कंधे पर उठाकर पांव-पांव चलकर दिखाया है।

चंट विपक्षी इसमें भी शाह जी के साथ चीटिंग कर गए। जंतर-मंतर पर, कनॉट प्लेस में, राजधानी की बाकी सड़कों पर, तिरंगा लहराने के लिए शाह जी की सरकारी पुलिस से लेकर, भागवत जी के प्राइवेट लठैतों तक से जो भिड़े-पिटे, वो कौन थे? ज्यादातर जेन ज़ी थे, नौजवान थे। उनके जवाब में तिरंगा उठाकर पांव-पांव चलना पड़ रहा है, एक सीनियर सिटीजन को, बासठ साल के शाह जी को। यह बराबरी का मुकाबला तो नहीं है भाई!

अब प्लीज कोई ये मत कहने लगना कि शाह जी को अगर अपने मोटा भाई के राज के बारह साल बाद, पांव-पांव चलकर सड़कों की खाक छाननी पड़ रही है, तो इसके लिए भी छोटा भाई और मोटा भाई ही जिम्मेदार हैं। अगर दोनों मिलकर, कानून बदलकर चुनाव आयोग अपने प्यादों के हवाले नहीं करते, तो न हरेक चुनाव में गड़बड़ी का शोर मचता है और न वोट चोरी की नौबत आती। जब चुनाव में गड़बड़ी और वोट चोरी होती ही नहीं, तो फिर विपक्ष को ही लोकतंत्र को बचाने के लिए, सड़कों पर उतरने की क्या जरूरत थी?

पहले तो कभी विपक्ष चुनाव आयोग से लोकतंत्र को बचाने के लिए सड़कों पर नहीं उतरा। और विपक्ष लोकतंत्र बचाने सड़कों पर नहीं उतरता, तो शाह साहेब को भी सड़कों पर धक्के खाने की क्या जरूरत थी? इतने साल तो छोटा भाई को अपने पांव सड़क पर रखते कभी किसी ने नहीं देखा। ज्ञानेश कुमार को बचाना है, इसलिए बेचारे को बुढ़ापे में सड़कों की खाक छाननी पड़ रही है। उसे भी नहीं बचाएंगे, तो गद्दी कैसे बचाएंगे? न जाने कहां-कहां की खाक छाननी पड़ेगी!

और जो लोग मोदी जी-शाह जी की पार्टी के लोकतंत्र को बचाने के लिए जुलूस वगैरह निकालने के आइडिया पर ही हंस रहे हैं, उनके बारे में तो हमारा मुंह नहीं खुलवाया जाए, तो ही बेहतर है। ये अगर डेमोक्रेसी के विरोधी नहीं भी हों तो भी, डेमोक्रेसी के बारे में निरक्षर जरूर हैं। वरना सभी जानते हैं कि डेमोक्रेसी, बराबरी के बिना जिंदा नहीं सकती है। विपक्ष वाले डेमोक्रेसी को बचाने के लिए जुलूस निकालें, सभाएं करें, भाषण बाजी करें, जेल-वेल तक जाने पर तुल जाएं, तो यह उनका जनतांत्रिक अधिकार है। पर जो सत्ता सवार हैं, डेमोक्रेसी को बचाने के लिए जुलूस निकालें, सभा करें तो, सब ऐसे मुंह बिचकाएं जैसे बेचारों से कोई बड़ी भारी गलती हो गई हो, ये कहां की डेमोक्रेसी है! आंबेडकर जी के संविधान में क्या कहीं भी लिखा हुआ है कि डेमोक्रेसी को तो सिर्फ विपक्ष ही बचाएगा, सत्ता सवारों को डेमोक्रेसी को बचाने का अधिकार ही नहीं है। विरोधी कुछ भी कहें, शाह जी डेमोक्रेसी को बचाने का अपना और अपनी जोड़ी का अधिकार किसी को छीनने नहीं देंगे। जरूरत पड़ी तो डांडी मार्च 2.0 निकालने से भी पीछे नहीं हटेंगे। आखिर, वह भी गुजराती हैं।

हम इससे इनकार नहीं करते कि राज, मोटा भाई-छोटा भाई का है। ज्ञानू उनकी जेब में है — मीडिया उनकी गोदी में है, दोनों उनके दो बाजू हैं। न्याय की देवी की आंखों से जब से पट्टी हटायी गई है, वह राजमहल के इशारे देख-देखकर फैसले सुनाती है। माना कि सब उन्हीं के हाथ में है, फिर भी लोकतंत्र को बचाने का उनका अधिकार तो कोई नहीं छीन सकता।

बेशक, यह सवाल भी अपनी जगह सही है कि जब सब उनके हाथ में है, तो लोकतंत्र को बचाएंगे किससे? लेकिन, लोकतंत्र को बचाने के लिए वे, किसी और के लोकतंत्र के लिए खतरा पैदा करने के मोहताज नहीं हैं। खुद खतरा पैदा करेंगे, तब भी लोकतंत्र को वे ही बचाएंगे। इस मामले में भी वे पूरी तरह से आत्मनिर्भर हैं.

फिर भी अगर लोकतंत्र को किसी और से ही बचाना जरूरी हो तब भी, छोटा भाई-मोटा भाई के पास उसका भी इंतजाम है। और कोई नहीं मिला, तो जनता से ही लोकतंत्र को बचाएंगे, पर बचाएंगे जरूर। बल्कि उसी के इंतजाम के चक्कर में तो शाह साहेब को सड़कों पर भटकना पड़ रहा है।

(व्यंग्यकार वरिष्ठ पत्रकार और साप्ताहिक ‘लोकलहर’ के संपादक हैं।)

 

रिपोर्ट – जगदीश शुक्ला

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