ये ट्रंप चाचा कल तक चिल्ला रहे थे कि भारत पर 100% टैरिफ लगा दूँगा, पूरी दुनिया को हिला दूँगा। भारत तो डेड इकॉनमी है। लेकिन अचानक ऐसा क्या हुआ कि ट्रंप चाचा एकदम शांत हो गए? इसके पीछे की पूरी कहानी बताता हूँ, मेरे अनुभव के हिसाब से ।
तारीख याद रखना, 12 सितंबर 2026। नई दिल्ली में BRICS का सम्मेलन हुआ था। वहाँ नरेंद्र मोदी जी ने एक बंद कमरे में रूस के राष्ट्रपति पुतिन, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और ईरान के राष्ट्रपति पेजेशकियन के साथ मीटिंग की। सबके सामने एक बड़ी परेशानी थी कि अमेरिका भारत पर 100% टैरिफ लगाने की धमकी दे रहा था।
तभी मोदी जी ने आराम से चाय की चुस्की ली, अपने हाथ से दाढ़ी सहलाई और बोले, “रिलैक्स जेंटलमैन, मेरे पास एक जबरदस्त गुजराती आइडिया है।”
मोदी जी ने ईरान के राष्ट्रपति से कहा, “दोस्त, कुछ दिनों के लिए होर्मुज़ की खाड़ी पर दबाव थोड़ा और बढ़ा दो।” इस पर ईरान वाले घबरा गए और बोले, “सर, इससे तो आपको ही परेशानी होगी।” मोदी जी ने जवाब दिया, “उसकी चिंता मत करो, हम मैनेज कर लेंगे।”
शी जिनपिंग ने भी इस बात पर सिर हिला दिया।
इसके बाद मोदी जी पुतिन की तरफ मुड़े और बोले, “मित्र व्लादिमीर, तुम रूस जाकर ऐलान कर दो कि हम अपना तेल उत्पादन कम कर रहे हैं। इसकी वजह चाहे यूक्रेन के ड्रोन को बता देना या फिर कह देना कि रिफाइनरी में चूहे बहुत हो गए हैं। बहाना कुछ भी चलेगा।”
मोदी जी का हिसाब सीधा था। अगर दुनिया में तेल की सप्लाई कम होगी, तो तेल की कीमतें बढ़ेंगी। तेल महँगा होगा, तो अमेरिका में भी पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ेंगी। और अमेरिका में मिडटर्म चुनाव आने वाले हैं। ऐसे में ट्रंप के लिए बढ़ती तेल की कीमतों को संभालना मुश्किल हो जाएगा। आखिरकार महँगा पेट्रोल-डीजल अमेरिकी वोटरों को भी परेशान करेगा।
फिर वही हुआ, जिसकी उम्मीद थी। ट्रंप चाचा को अपनी परेशानी समझ में आने लगी और उन्होंने सीधे पुतिन को फोन लगा दिया।
ट्रंप बोले, “दोस्त, हमें डीजल चाहिए। तुम हमें डीजल भेज दो।”
अब टैरिफ गया तेल लेने!
इसके बाद ट्रंप ने अपने देश के लोगों के सामने जाकर अपनी डील का प्रचार किया। उन्होंने कहा कि देखो, मैंने अमेरिका के फायदे के लिए पुतिन से भी समझौता किया है और आपके लिए सस्ती कीमत पर डीजल लाने का इंतजाम किया है।
इसके बाद ट्रंप की नजर भारत पर गई। उन्होंने अपने विदेश मंत्री मार्को रुबियो को भारत भेज दिया।
रुबियो जी मुंबई के छत्रपति शिवाजी इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर उतरे। उन्हें लेने के लिए महाराष्ट्र के सांस्कृतिक मंत्री आशीष शेलार जी पहुँचे। यानी अमेरिका के विदेश मंत्री को लेने के लिए महाराष्ट्र सरकार के मंत्री आए।
इसके बाद एक लेफ्टिस्ट पत्रकार ने रुबियो से सवाल पूछा कि दिल्ली में प्रदर्शन हो रहे हैं, वोट चोरी के आरोप लग रहे हैं, तो इस पूरे मामले पर अमेरिका का क्या कहना है?
पत्रकार को लगा होगा कि अब अमेरिका मोदी सरकार को ज्ञान देगा और भारत के खिलाफ बयान देगा। लेकिन रुबियो ने साफ कह दिया, “यह भारत का अंदरूनी मामला है। हम इस पर कुछ नहीं बोलेंगे।”
यानी जिस बात पर कुछ लोग अमेरिका से भारत को घेरने की उम्मीद लगाए बैठे थे, उस पर अमेरिका ने ही बोलने से इनकार कर दिया।
इसके बाद रुबियो जी उन अडानी और अंबानी से भी मिले, जिनके खिलाफ राहुल गांधी हमेशा बोलते रहते हैं।
अंबानी जी से मिलने के लिए तो रुबियो जामनगर तक पहुँच गए।
वहाँ जाकर उन्होंने अंबानी जी से कहा, “भाई, हमने वेनेज़ुएला पर कब्जा कर लिया है और वहाँ से बहुत सारा कच्चा तेल आ रहा है। लेकिन उस तेल को अच्छी क्वालिटी के पेट्रोल-डीजल और दूसरे उत्पादों में बदलने के लिए हमें ऐसी रिफाइनरी चाहिए, जहाँ यह काम कम खर्च में हो सके। आपकी रिफाइनरी दुनिया की उन खास रिफाइनरियों में से है, जो इस तेल को अच्छी तरह प्रोसेस कर सकती है। इसलिए आप हमारा वेनेज़ुएला वाला तेल रिफाइन करके भेज दीजिए।”
इस तरह अंबानी जी को भी बड़ा बिजनेस मिल गया।
अब इस पूरे मामले का हिसाब समझिए। एक तरफ अंबानी जी को रिफाइनिंग का बड़ा काम मिल गया। दूसरी तरफ भारत पर टैरिफ बढ़ने का जो संकट मंडरा रहा था, उससे राहत मिलने की उम्मीद बन गई। भारत की अर्थव्यवस्था को भी इससे फायदा हो सकता है और 8% GDP ग्रोथ का लक्ष्य हासिल करने की उम्मीद मजबूत हो सकती है।
वहीं दूसरी तरफ ट्रंप चाचा को भी अपने अमेरिकी वोटरों के सामने दिखाने के लिए पुतिन के साथ तेल की डील मिल गई। यानी उन्हें भी अपनी राजनीति चमकाने का मौका मिल गया।
और अब राहुल गांधी, कांग्रेस और उनके समर्थकों का क्या होगा, वो तो आगे पता चलेगा।







