प्रयागराज :
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने शिक्षा जगत से जुड़े एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि गैर-सहायता प्राप्त निजी विद्यालयों (Un-aided Private Schools) के शिक्षकों की बर्खास्तगी या सेवा समाप्ति के मामलों में उच्च न्यायालय के समक्ष संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका (Writ Petition) पोषणीय नहीं है।
अदालत ने यह व्यवस्था दी है कि इस तरह के सेवा विवाद विशुद्ध रूप से एक निजी संविदा (Contractual Dispute) के दायरे में आते हैं।
फैसले के मुख्य बिंदु:
निजी संस्थान ‘राज्य’ की श्रेणी में नहीं :
अदालत का मानना है कि गैर-सहायता प्राप्त निजी स्कूल सरकार से वित्तीय सहायता या नियंत्रण प्राप्त नहीं करते हैं, इसलिए वे संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत ‘राज्य’ (State) की परिभाषा में नहीं आते। परिणामस्वरूप, उनके आंतरिक प्रशासनिक और सेवा मामलों में सीधे रिट याचिका के माध्यम से न्यायिक समीक्षा नहीं की जा सकती।
मालिक और कर्मचारी का निजी अनुबंध:
शिक्षक और प्रबंधन के बीच का संबंध नियोक्ता और कर्मचारी के बीच के संविदात्मक समझौते (Employment Contract) पर आधारित होता है।
वैकल्पिक कानूनी रास्ते :
यदि किसी शिक्षक को लगता है कि उसकी सेवा समाप्ति अवैध या अनुचित है, तो उसके पास इसके लिए सिविल कोर्ट में मुकदमा दायर करने या अन्य निर्धारित कानूनी मंचों पर हर्जाने व राहत की मांग करने का विकल्प खुला रहता है।
शिक्षकों और प्रबंधनों के लिए क्या हैं मायने?
यह निर्णय निजी शिक्षण संस्थानों में कार्यरत शिक्षकों और उनके प्रबंधकों के बीच के विवादों के समाधान के लिए एक बड़ा कानूनी संदेश देता है। इसके तहत अब शिक्षकों को अपनी सेवा संबंधी शिकायतों के लिए सीधे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने के बजाय सिविल अदालतों या अन्य उपयुक्त श्रम/औद्योगिक मंचों का रुख करना होगा।







