यौन अपराधों से बालक/बालिकाओं की सुरक्षा अधिनियम-2012 (POCSO Act) एवं बाल अधिकारों” के सम्बंध में विधिक जागरुकता शिविरों का हुआ आयोजन

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जनपद बांदा

माननीय राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण-नई दिल्ली तथा उ०प्र० राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण, लखनऊ के तत्वावधान में एवं माननीया जनपद न्यायाधीश / अध्यक्षा, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, बांदा अल्पना के निर्देशन में बाल संरक्षण से सम्बन्धित कानूनी ढांचे के बारे छात्र-छात्राओं में जागरुकता पैदा करने हेतु विशेष अभियान के अन्तर्गत दिनांक 30-09-2026 को “यौन अपराधों से बालक/बालिकाओं की सुरक्षा अधिनियम-2012 (POCSO Act) एवं बाल अधिकारों” के सम्बंध में विधिक जागरुकता शिविरों का आयोजन जनपद के विभिन्न विद्यालयों में किया गया। शिविरों के आयोजन का मुख्य उद्देश्य छात्र-छात्राओं के साथ होने वाले लैंगिक शोषण से बचाव व अपराधों से रोकथाम हैं जनपद के डी०ए०वी० इण्टर कॉलेज बांदा, आर्यकन्या इण्टर कॉलेज बांदा, सरस्वती बालिका विद्या मन्दिर केनपथ बांदा एवं तथागत ज्ञान स्थली हायर सकेण्ड्री स्कूल-अतर्रा में प्रार्थना सभा के दौरान जागरुकता शिविर का आयोजन किया गया।

सर्वप्रथम संजय कुमार सिंह-अपर जिला जज (ई०सी०एक्ट), बांदा द्वारा बताया गया कि बच्चों के साथ शारीरिक, मानसिक, यौनिक अथवा भावनात्मक स्तर पर किया जाने वाला दुर्वयवहार बाल दुर्व्यवहार कहलाता है। हालाँकि हम बाल दुव्यवहार में सामान्यतः यौनिक एवं शारीरिक शोषण को ही शोषण समझते हैं, जबकि मानसिक तथा भावनात्मक स्तर पर होने वाला शोषण भी बच्चों के मानस पर दीर्घकालिक प्रभाव डालता है। बाल यौन शोषण का दायरा केवल बलात्कार या गंभीर यौन आघात तक ही सिमटा नहीं है बल्कि बच्चों को इरादतन यौनिक कृत्य दिखाना अनुचित कामुक बातें करना गलत तरीके से छूना जबरन यौन कृत्य के लिये मजबूर करना भोलेपन का फायदा उठाने के लिये चॉकलेट पैसे आदि का प्रलोभन देना चाइल्ड पोर्नोग्राफी बनाना आदि बाल यौन शोषण के अंतर्गत आते हैं।

सौरव सिंह-सचिव, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण-बांदा ने अपने सम्बोधन में कहा कि इन अपराधों में अक्सर शामिल व्यक्ति हमारे आस-पास के रिश्तेदार, मित्र, पड़ोसी होते हैं, जिनकी हरकतों से उनके कृत्य का पता लगाना कठिन होता है। कई बार बाल दुर्व्यवहार मजाक करते-करते कर लिया जाता है। कई बार व्यक्ति अपनी दबी यौन कुंठा एवं मनोविकार से ग्रस्त होने के कारण ऐसा करता है, तो कई बार पारिवारिक कलह, पीढ़ीगत दूरी के कारण भी बच्चों के स्वास्थ, शरीर व गरिमा को क्षति पहुँचाया जाती है। जिसमें बेवजह बच्चों को पीटना, तेजी से झकझोरना, खिल्ली उड़ाना, उपेक्षा करना शामिल है। बच्चे न तो मजबूत प्रतिरोध कर पाते हैं और न हीं उनमें यौन चेतना का विकास होता है। जिससे वे ऐसे अपराधियों के लिये ‘सॉफ्ट टारगेट्स’ बन जाते हैं। हालाँकि ऐसे पीडित बच्चों में लडके एवं लडकियाँ दोनों निशाना बनते हैं, लेकिन सामान्यतः इसमें लड़कियों का अनुपात अधिक होता है।

सिविल जज (अर्पिता सिंह- (सी०डि०/ त्वरित) बांदा ने अपने सम्बोधन में कहा कि भारत में बाल यौन शोषण एवं दुर्वयवहार के खिलाफ सबसे प्रमुख कानून 2012 में पारित यौन अपराध के विरुद्ध बच्चों का संरक्षण कानून (POCSO) है। इसमें अपराधों को चिह्नित कर उनके लिये सख्त सजा निर्धारित की गई है। साथ ही त्वरित सुनवाई के लिये स्पेशल कोर्ट का भी प्रावधान है। यह कानून बाल यौन शोषण के इरादों को भी अपराध के रूप में चिह्नित करता है तथा ऐसे किसी अपराध के संदर्भ में पुलिस, मीडिया एवं डॉक्टर को भी दिशानिर्देश देता है।

आयुषी पाण्डेय-सिविल जज (जू०डि०) बांदा ने अपने सम्बोधन में कहा कि वैसे तो देश में बालक/बालिकाओं के साथ होने वाले यौन शोषण एवं दुर्व्यवहार के खिलाफ व्यापक कानूनी ढाँचा है. किन्तु इतने कानूनो एवं योजनाओं के बावजूद तकनीकी चूक तथा कार्यान्वयन में अनियमितता, त्वरित कार्रवाई न होने के कारण ये घटनाएँ होती हैं।

सुमांशु दास-सिविल जज (जू०डि०/ त्वरित) बांदा ने अपने सम्बोधन में शिक्षा का अधिकार अधिनियम-2009 के अन्तर्गत बताया कि निःशुल्क प्राथमिक शिक्षा पाने का अधिकार प्रत्येक बच्चें का मौलिक अधिकार हैं. चाहें उसकी जाति, लिंग, राष्ट्रीयता या जातीयता कुछ भी हों। इस अधिनियम के तहत प्राईवेट/निजी स्कूलों में 25 प्रतिशत सीटें आर्थिक रुप से कमजोर वर्गों और वंचित समूहों के बच्चों के लिए आरक्षित की गयी हैं।

आलोक कुमार वर्मा न्यायाधिकारी, ग्राम न्यायालय नरैनी द्वारा बताया गया कि बाल अपराधों से बचाव के लिये सजगता एवं जागरूकता अति आवश्यक हैं। ऐसे में जरूरी है कि प्राथमिक स्तर पर घर-परिवार, माता-पिता एवं परिजन बच्चों से मिलने वालों एवं उनके साथ खेलने वालों के प्रति सजग रहे वहीं बच्चों को भी असामान्य ‘व्यवहार’ के प्रति सजग रहने के लिये प्रेरित करना चाहिये। स्कूलों में जहाँ अनिवार्य मनोवैज्ञानिक कैंप होने चाहिये, तो वहीं डॉक्टर, मीडिया व पुलिस को भी इन घटनाओं के प्रति संवेदनशील होना चाहिये। इंटरनेट, मोबाइल, सोशल मीडिया के अश्लील सामग्री पर अविलंब रोक लगनी चाहिये। वही इंटरनेट साइट्स पर पैरेंटल कंट्रोलन के विकल्प को मजबूत करना चाहिये।

जागरुकता शिविर में राशिद अहमद डी.ई.ओ. के साथ पराविधिक स्वयं सेवक विवेक कुमार त्रिपाठी, अर्जित अग्रवाल, अवनीश सोनी, सत्यम सेन तथा विभिन्न विद्यालयों के अध्यापक /अध्यापिकाएं उपस्थित रही।

रिपोर्ट – सुनील यादव

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