वाराणसी
हिंदुस्तान के हर गरीब बहुत बड़ा भरोसा करके देश का साथ दिया, उम्मीद के साथ अच्छा प्रधानमंत्री चुनां लेकिन उनके नज़रों में अच्छे दिन देखने को नहीं मिला।
आपके किस्मत का सिक्का उछलते -उछलते गरीबों के थाली में नहीं गिरा। वों आज भी खाली है, महंगाई का बागडोर ऐसे पकड़ा की अमीरों कीं थाली चांदी की तरह चमकतां बढ़ता रहेगा।
यह लोकतंत्र का चाल नहीं है
यह नीति केवल राजतंत्र का खेल है। गरीब गरीब ही रहेंगे। अमीर अमीर ही रहेंगे।
सबसे बड़ी बात यह है, जब इस देश में गरीब ही नहीं रहेंगे इस महंगाई के मार से सबका अंत हो जाएगां, तो हमारे देश में आमिर ही तो रहेंगे।
इस देश का राजनीति का खेल राम भरोसे, इस देश में सिर्फ राजनीति का खेल जातिवांद हो गया। पक्ष- विपक्ष महंगाई का मुद्दा दर किनार रखते हुए जातिवाद हो गया। हिंदुस्तान की नईयां राम भरोसे।
अब इस देश में कलयुग का सायां प्रचंड आसमान में पहुंच रहा है, महंगाई ऐसी की राशन कार्ड वाले भी करोड़पति लगते हैं। इसके पास झोपड़ी नहीं, लोन फुटपाथ पर आधार कार्ड का तकिया बनाकर सोता है। और जिसके पास 04 मंजिला कोठी है,वों लाइन में लगकर गरीब का राशन लें जाता है। सरकारी मूलाजिंम आंख बंद करके ठप्पा मार देता है।
बनारस में, 100 100 करोड़ की सौगात आई ए ढोल- नगाड़े में वाहवाहीं लूट कर चले जाते हैं उनके लिए यही अच्छे दिन है, पर ढोल की आवाज में उसे मजदूर की भूख -दर्द को दबा दिया जाता है। जो के उत्तर प्रदेश में फैक्ट्री कारखाना न होने से गरीब बेरोजगार हैं। सुबें के सरकार में डिहारी- मजदूरी 780 रुपया सरकार की तरफ से आदेश हुआं लेकिन यहां जमीदारी चलती है अमीरों की काम करना हो तो इतने में करो नहीं अपना छुट्टी करो
इसलिए मार्केटिंग अधिकारी ऑफिस में बैठे हीं ठप्पा मारनें में सफल है, उनके ऊपर कोई कार्रवाई सरकार की नहीं है। यही राजतंत्र है, लोकतंत्र नहीं है। कहांवत है जैसे बड़े मछली छोटी मछली को खां जाता है उसीं तरह इस देश का उछलता सिक्का है। अमीरों के थाली में पढ़ता रहेगा।
जिसकी लाठी उसकी भैंस
इस देश के गरीब जनता को अब सें जांग जावों , नहीं तो पाकिस्तान की तरह भूखे तड़प तड़प के अपनी आंह लीला समाप्त होनें के कगार पर हो जाओगे।
नेता चुनाव से पहले आप मदारी नहीं, सेवक बनते हो, घर-घर जाकर वोट की भीख मांगते हो कसम खाते हो। कुर्सी मिलते ही स्क्रिप्ट बदल जाती है। फिर शुरू होता है फिल्मी सीन ः जाति का तड़का, गालीं का डायलॉग, और क्लाइमेक्स में पीड़ित के घर जाकर आंसू पोछनें का ड्रामा। वांह।
इस देवभूमि में कण-कण में भगवान है। पर लगता है नेताओं के कानों में जनता की आवाज नहीं पहुंचती है। विदेशी यहां का संस्कार लेने आते हैं, और घर के भेदियों, का तमाशा देखकर वापस जाते हैं। आपके डमरू पर 40% अब सवाल पूछ रहा है वों बुद्धिजीवी हैं अंधभक्त नहीं
मांग छोटी सी है, जाति धर्म का डमरू बंद करो, फैक्ट्री का सायरन बजाओ जिस दिन हर हाथ को कम मिलेगा, उसे दिन मान लेंगे की अच्छे दिन आ गए। वरना इतिहास आपकी आने वाली पीढ़ी से सवालपूछेगा। और तब कोई डमरू काम नहीं आएगा।







