जौनपुर।
भारत किसान यूनियन के राष्ट्रीय अध्यक्ष, समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय सचिव एवं पूर्व विधायक जौनपुर सदर मोहम्मद अरशद खान ने आज पीडीए भवन कटघरा जौनपुर में आयोजित एक महत्वपूर्ण बैठक को संबोधित करते हुए कहा कि देश में लंबे समय से गाय के नाम पर जनभावनाओं को भड़काकर समाज में तनाव और दंगे-फसाद कराने की राजनीति की जाती रही है। उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि इस विषय पर भावनात्मक उन्माद नहीं, बल्कि गंभीर राष्ट्रीय बहस और व्यावहारिक नीति तैयार की जाए।
उन्होंने कहा कि गौवंश केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं है, बल्कि भारत की कृषि, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, संस्कृति और सामाजिक संरचना का महत्वपूर्ण आधार रहा है। सदियों तक भारत की अर्थव्यवस्था खेती और पशुधन पर आधारित रही। किसी परिवार की समृद्धि का आकलन उसके पशुधन, बैलों, गायों और खेती से किया जाता था। गांवों में दरवाजे पर खड़े मजबूत बैल किसान की आर्थिक शक्ति और सम्मान का प्रतीक माने जाते थे।
मोहम्मद अरशद खान ने कहा कि एक समय ऐसा था जब खेती पूरी तरह बैलों से होती थी। बैलगाड़ियां परिवहन का प्रमुख साधन थीं। ग्रामीण जीवन, कृषि व्यवस्था और स्थानीय व्यापार पूरी तरह पशुधन पर आधारित थे। लेकिन आधुनिक मशीनों, ट्रैक्टरों और तकनीकी संसाधनों के आने के बाद बैलों की उपयोगिता लगातार कम होती चली गई। आज किसान आर्थिक मजबूरी के कारण बैल पालने से पीछे हट रहा है। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि बैल की उपयोगिता समाप्त हो गई तो भविष्य में गाय भी संकट में पड़ जाएगी, क्योंकि गौवंश का अस्तित्व परस्पर जुड़ा हुआ है।
उन्होंने कहा कि केवल भावनात्मक नारे लगाने से गौवंश की रक्षा संभव नहीं है। इसके लिए आर्थिक मॉडल, वैज्ञानिक नीति और व्यवहारिक समाधान तैयार करने होंगे।उन्होंने देश के सभी धर्माचार्यों, शंकराचार्यों, महामंडलेश्वरों, सामाजिक चिंतकों, कृषि विशेषज्ञों, पत्रकारों, बुद्धिजीवियों और विशेष रूप से हिंदू समाज से अपील करते हुए कहा कि इस विषय पर राष्ट्रव्यापी संवाद होना चाहिए कि आधुनिक भारत में बैल की उपयोगिता कैसे बढ़ाई जाए और पशुधन आधारित अर्थव्यवस्था को कैसे पुनर्जीवित किया जाए।
मोहम्मद अरशद खान ने कहा कि इतिहास गवाह है कि भारत की साझा संस्कृति और सामाजिक सद्भाव को बनाए रखने के लिए विभिन्न शासकों ने समय-समय पर संवेदनशील विषयों पर संतुलित और संयमित नीतियां अपनाईं। उन्होंने कहा कि प्रथम मुगल सम्राट बाबर ने अपने पुत्र हुमायूं बादशाह को यह सलाह दी थी कि भारत में हिंदू समाज गाय को पूजनीय मानता है, इसलिए सामाजिक सद्भाव और भाईचारे के लिए गाय काटने पर रोक लगाई जाए।
उन्होंने कहा कि इतिहास में उल्लेख मिलता है कि हुमायूं ने सामाजिक सौहार्द को बनाए रखने के उद्देश्य से गाय काटने पर प्रतिबंध की नीति अपनाई थी और मुगल काल के अनेक शासकों ने भी धार्मिक संवेदनशीलता के विषयों पर संतुलित दृष्टिकोण अपनाया।
मोहम्मद अरशद खान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मांग करते हुए कहा कि पूरे देश में गाय काटने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाए ताकि करोड़ों हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं और आस्था का सम्मान सुनिश्चित हो सके।
इसके साथ ही उन्होंने यह भी मांग की कि बैल को उद्योग का दर्जा दिया जाए तथा पशुपालन आधारित अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए सरकार राष्ट्रीय स्तर पर नई नीति बनाए। उन्होंने कहा कि यदि सरकार वैज्ञानिक, व्यवहारिक और रोजगारपरक नीति तैयार करे तो पशुपालन के क्षेत्र में करोड़ों लोगों को रोजगार मिल सकता है, किसानों की आय बढ़ सकती है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई मजबूती मिल सकती है।
उन्होंने कहा कि भारत कृषि प्रधान देश है और यहां पशुधन आधारित उद्योगों की अपार संभावनाएं हैं। यदि सरकार इस क्षेत्र को संगठित ढंग से विकसित करे तो किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी, ग्रामीण युवाओं को रोजगार मिलेगा और देश की अर्थव्यवस्था को भी लाभ पहुंचेगा। मोहम्मद अरशद खान ने कहा कि देश को नफरत, उन्माद और टकराव की राजनीति से ऊपर उठकर सामाजिक सद्भाव, किसानों की आर्थिक मजबूती, पशुधन संरक्षण और राष्ट्रीय विकास की दिशा में ठोस एवं दूरदर्शी नीति बनानी चाहिए।
उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में हर विषय पर संवाद, बहस और संवैधानिक तरीके से समाधान निकलना चाहिए। केवल राजनीतिक लाभ के लिए समाज को बांटने का प्रयास देशहित में नहीं है। भारत की असली ताकत उसकी गंगा-जमुनी तहजीब, सामाजिक एकता और किसानों की मेहनत में निहित है।







