गोरखपुर। पैतृक जमीन के नामांतरण में फर्जीवाड़े का आरोप लगाते हुए श्याम नारायण तिवारी ने बुधवार को गोरखपुर जर्नलिस्ट्स प्रेस क्लब में प्रेसवार्ता की। उन्होंने आरोप लगाया कि उनके पिता उमेश तिवारी के नाम वर्ष 1990 से दर्ज करीब चार एकड़ 11 डिसमिल पैतृक जमीन को कथित जालसाजों ने फर्जी दस्तावेज, वसीयतनामा, नोटिस और गवाह तैयार कर अपने नाम दर्ज करा लिया। उनका कहना है कि जिस अवधि में कथित फर्जीवाड़े की कार्रवाई की गई, उस दौरान उनके पिता जेल में बंद थे।
मामले में उन्होंने मुख्यमंत्री सहित पुलिस के उच्चाधिकारियों से शिकायत कर कार्रवाई की मांग की है।श्याम नारायण तिवारी ने प्रेसवार्ता में बताया कि ग्राम बसवार में उनके परिवार की पैतृक जमीन वर्ष 1990 से उनके पिता उमेश तिवारी के नाम दर्ज थी। उनका आरोप है कि जालसाजों ने उनके पिता के पिता रमाकान्त तिवारी के नाम से उन्हें उमेश तिवारी का पिता दर्शाते हुए तथा अन्य तथ्यों में हेरफेर कर जमीन से संबंधित दस्तावेज तैयार कराए।
इसके बाद फर्जी वसीयतनामा और अन्य दस्तावेजों के आधार पर उनके पिता के नाम दर्ज जमीन को दूसरे लोगों के नाम दर्ज कराने की प्रक्रिया शुरू की उन्होंने आरोप लगाया कि उनके पिता उमेश तिवारी वर्ष 1997 से वर्ष 2003 तक जेल में बंद थे। इसी दौरान कथित जालसाजों ने जमीन से संबंधित कई दस्तावेज तैयार कराए और तहसील स्तर पर नामांतरण की कार्रवाई कराई।
श्याम नारायण का कहना है कि जब उनके पिता जेल में बंद थे तो उन्हें जमीन से संबंधित नोटिस तामील कैसे कराया गया, यह जांच का महत्वपूर्ण विषय है। उन्होंने आरोप लगाया कि फर्जी नोटिस तैयार कर उसकी तामील भी दर्शाई गई और बाद में नामांतरण का आदेश पारित कर जमीन दूसरे लोगों के नाम दर्ज करा दी गई।
प्रेसवार्ता में उन्होंने कथित फर्जी वसीयतनामा और हिब्बानामा का भी जिक्र किया। उनका आरोप है कि 25 जुलाई 1997 की तारीख में तैयार किए गए हिब्बानामा में उनके दादा रमाकान्त तिवारी का अंगूठा निशान दर्शाया गया है, जबकि वास्तविक रूप से जमीन उनके पिता उमेश तिवारी के नाम दर्ज थी। उन्होंने कहा कि दस्तावेजों में अलग-अलग तरह की कहानियां और तथ्य प्रस्तुत किए गए हैं, जिससे पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की आवश्यकता है।
श्याम नारायण तिवारी ने आरोप लगाया कि कथित जालसाजों ने गांव के पांच लोगों के हस्ताक्षर भी फर्जी तरीके से कराकर उन्हें दस्तावेजों में गवाह बना दिया। उनका दावा है कि इन लोगों ने न तो किसी दस्तावेज पर गवाही दी और न ही हस्ताक्षर किए हैं। उन्होंने मांग की कि संबंधित दस्तावेजों की फोरेंसिक जांच कराकर हस्ताक्षरों और अंगूठे के निशान की वास्तविकता सामने लाई जाए।
उन्होंने कहा कि मामले में अलग-अलग स्तर पर अलग-अलग कथानक प्रस्तुत किए गए हैं। उनका आरोप है कि कथित जालसाजी से जुड़े मुकदमे में विवेचना के दौरान भी एक अलग कहानी दर्शाते हुए अंतिम रिपोर्ट लगाई गई। उन्होंने कहा कि यदि दस्तावेजों और घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच की जाए तो कथित फर्जीवाड़े की पूरी तस्वीर सामने आ सकती है।
एक साल से अधिकारियों के चक्कर लगाने का दावा श्याम नारायण तिवारी ने प्रेसवार्ता में आरोप लगाया कि इस मामले में उनके विरोधी पट्टीदार और मुकदमे से जुड़े सच्चिदानन्द तिवारी, रणजीत तिवारी और राजीव तिवारी समेत तत्कालीन तहसीलदार घुघली की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए। हालांकि, इन लोगों पर लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
उन्होंने सवाल उठाया कि यदि उनके पिता उस समय जेल में बंद थे तो उनके नाम नोटिस जारी होने, नोटिस की तामील होने और नामांतरण की कार्रवाई कैसे पूरी हो गई। उन्होंने कहा कि इस पूरे मामले में राजस्व अभिलेखों, नोटिस तामील की प्रक्रिया, कथित वसीयतनामा, हिब्बानामा और नामांतरण आदेश की जांच कराई जानी चाहिए।
श्याम नारायण तिवारी के अनुसार वह करीब एक वर्ष से मुख्यमंत्री और पुलिस के उच्चाधिकारियों सहित संबंधित अधिकारियों को मामले की जानकारी देकर कार्रवाई की मांग कर रहे हैं, लेकिन अभी तक उन्हें न्याय नहीं मिल सका है। उन्होंने शासन-प्रशासन से पूरे मामले की उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जांच कराने, फर्जी दस्तावेज तैयार करने वालों की पहचान कर उनके खिलाफ कार्रवाई करने तथा पैतृक जमीन से संबंधित अभिलेखों की जांच कराने की मांग की।
उन्होंने कहा कि उनका उद्देश्य किसी व्यक्ति को बदनाम करना नहीं, बल्कि कथित फर्जीवाड़े की निष्पक्ष जांच कराकर वास्तविक तथ्यों को सामने लाना और अपने परिवार की पैतृक संपत्ति के संबंध में न्याय प्राप्त करना है। प्रेसवार्ता के दौरान उन्होंने उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर पूरे मामले की जांच कराने की मांग दोहराई।







