नए एआई मॉडल्स ने साइबर हमलों की रफ्तार और उनकी जटिलता को कई गुना बढ़ा दिया है। ऐसे में भारत के लिए अब साइबर सुरक्षा को प्राथमिकता देना जरूरी हो गया है। मिथोस जैसे नए एआई मॉडल्स के आने के साथ साइबर सुरक्षा के क्षेत्र में एक निर्णायक बदलाव दिखाई दे रहा है। इन मॉडलों की क्षमताओं ने ऐसी कमजोरियों का पता लगाना आसान बना दिया है, जिनका पहले पता लगाना बेहद कठिन था। इसके बावजूद निवेशक और कॉरपोरेट जगत अभी भी उभरते साइबर जोखिमों को लेकर पूरी तरह गंभीर नजर नहीं आते।
हाल के अध्ययनों और रिपोर्टों ने दिखाया है कि अत्याधुनिक एआई मॉडल अब जटिल साइबर सुरक्षा परीक्षणों को स्वायत्त रूप से पूरा करने में पहले की तुलना में कहीं अधिक सक्षम हैं। ये मॉडल छोटी-छोटी कमजोरियों को जोड़कर ऐसे हमलों की योजना बना सकते हैं, जिनके तरीके पहले आसानी से संभव नहीं थे। विशेषज्ञों का अनुमान है कि एआई की मदद से किसी कमजोरी का पता लगाने और उसका फायदा उठाने के बीच का समय लगातार कम होता जाएगा। इसका सीधा अर्थ है कि साइबर हमलों की स्थिति में प्रतिक्रिया देने के लिए संस्थानों के पास बहुत कम समय बचेगा।
यह खतरा केवल अमेरिका तक सीमित नहीं है। चीन समेत अन्य देशों के एआई मॉडल भी तेजी से इस क्षमता की ओर बढ़ रहे हैं। ओपन-वेट मॉडल्स के आसानी से उपलब्ध होने और उनके सुरक्षा नियंत्रणों को कमजोर किए जाने की संभावना ने जोखिम को और बढ़ा दिया है। यदि ऐसी क्षमताएं व्यापक रूप से उपलब्ध होती हैं तो रैनसमवेयर गिरोहों, आतंकवादी संगठनों और व्यक्तिगत हैकरों के लिए भी अत्याधुनिक साइबर हमले करना आसान हो सकता है।
एक और बड़ी चिंता ओपन सोर्स सॉफ्टवेयर को लेकर है। आज अधिकांश व्यावसायिक सॉफ्टवेयर में किसी न किसी रूप में ओपन सोर्स घटक शामिल होते हैं। इनमें से कई परियोजनाएं सीमित संख्या में डेवलपर और मेंटेनर के भरोसे चलती हैं। ऐसे में किसी महत्वपूर्ण ओपन सोर्स घटक में मौजूद कमजोरी का असर एक साथ बड़ी संख्या में कंपनियों और संस्थानों पर पड़ सकता है। दुर्भावनापूर्ण तत्वों द्वारा इस भरोसे की संस्कृति का दुरुपयोग किया जाना भी गंभीर खतरा है।
साइबर सुरक्षा की चुनौती केवल क्लाउड और कंप्यूटर नेटवर्क तक सीमित नहीं है। बिजली ग्रिड, जल आपूर्ति, पाइपलाइन और अन्य औद्योगिक नियंत्रण प्रणालियां भी साइबर हमलों का निशाना बन सकती हैं। इंटरनेट से जुड़ी ऐसी प्रणालियों में व्यवधान का सीधा असर आम लोगों और देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। केवल इसलिए कि कोई सिस्टम क्लाउड पर नहीं है, वह साइबर हमले से सुरक्षित नहीं हो जाता।
एआई आधारित साइबर हमलों के इस दौर में भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती पुराने सॉफ्टवेयर और कमजोर डिजिटल बुनियादी ढांचे को आधुनिक बनाना है। खासकर राज्यों, नगरपालिकाओं, बिजली बोर्डों, जल आपूर्ति संस्थानों और छोटे एवं मध्यम उद्यमों में पुराने सिस्टम बड़ी कमजोरी साबित हो सकते हैं। कई संस्थान सिस्टम अपटाइम बनाए रखने और व्यवधान से बचने के लिए समय पर सुरक्षा पैच लागू नहीं करते। लेकिन अब हमलावरों की बढ़ती गति को देखते हुए यह रवैया महंगा साबित हो सकता है।
भारत को पुराने और असुरक्षित सॉफ्टवेयर तथा उपकरणों को चरणबद्ध तरीके से बदलने के लिए ‘कैश-फॉर-क्लंकर्स’ जैसी प्रोत्साहन योजना पर विचार करना चाहिए। इसके तहत पुराने सिस्टम हटाकर सुरक्षित और आधुनिक तकनीक अपनाने वाले संस्थानों को वित्तीय सहायता दी जा सकती है। इससे राज्य स्तरीय और स्थानीय स्तर के महत्वपूर्ण सेवा प्रदाताओं को आधुनिक डिजिटल बुनियादी ढांचा अपनाने में मदद मिलेगी।
इसके साथ ही भारत को एक मजबूत केंद्रीय साइबर रक्षा व्यवस्था की जरूरत है, जो बड़े साइबर हमलों के दौरान महत्वपूर्ण अधोसंरचना और प्रमुख उद्यमों की मदद कर सके। साइबर हमलों से निपटने के लिए स्पष्ट मानक संचालन प्रक्रिया होनी चाहिए। सरकार, उद्योग और सुरक्षा एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय और स्वदेशी साइबर सुरक्षा क्षमता विकसित करना भी समय की मांग है।
सूचना साझा करने की व्यवस्था को भी मजबूत करना होगा। साइबर हमले की जानकारी, हमले के तरीके और उससे मिली सीख को एक सुरक्षित साझा मंच के माध्यम से संबंधित संस्थानों तक पहुंचाया जाना चाहिए। इससे दूसरे संगठन समय रहते समान हमलों से बचाव कर सकेंगे। बड़ी भारतीय कंपनियों के बीच साइबर सुरक्षा की सर्वोत्तम प्रक्रियाओं और हमलों से मिली सीख साझा करने की संस्कृति विकसित करना भी जरूरी है।
साइबर जोखिम की यह बाढ़ अब भारत के दरवाजे तक पहुंच चुकी है। हमलावरों की संख्या बढ़ रही है और एआई उन्हें पहले से कहीं अधिक सक्षम बना रहा है। इसके बावजूद कॉरपोरेट जगत और कई बोर्डों में साइबर सुरक्षा को वह प्राथमिकता नहीं मिल रही, जिसकी आज जरूरत है। भारतीय कंपनियों की बैलेंस शीट और बोर्ड स्तर की चर्चाओं में साइबर जोखिम का उल्लेख अभी भी सीमित दिखाई देता है। अधिकांश बोर्डों में साइबर सुरक्षा की विशेषज्ञता भी पर्याप्त नहीं है।
अब समय उम्मीद करने का नहीं, तैयारी करने का है। भारत को अपने डिजिटल और भौतिक बुनियादी ढांचे को आधुनिक बनाने के साथ-साथ साइबर सुरक्षा के लिए तेज, समन्वित और स्वदेशी सुरक्षा तंत्र तैयार करना होगा। आने वाले समय में साइबर व्यवधान केवल तकनीकी समस्या नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता का सवाल भी हो सकता है।










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