या हि वैश्रवणे लक्ष्मीर्या चन्द्रे हरिवाहने।
सा रावणगृहे रम्या नितमेवानपायिनी ।।
जो लक्ष्मी कुबेर, चन्द्रमा और इंद्र के पास रहती है वही लक्ष्मी रावण के गृह में नित्य निश्चल होकर अधिक सुरम्यता से रह रही थी।
उसी रावणी सोने की लंका में हनुमानजी ने आग लगा दी थी। वही हनुमान जी अयोध्या के संरक्षक हैं।
रामसत्ता बड़ी है या राजसत्ता?
धर्म सत्ता बड़ी है या अर्थ सत्ता?
इसका निर्णय काल देवता कर देंगे।
मध्य कालीन भारत में भी अब्दुल सक्रिय था, वह लव जिहाद कर रहा था, लूटी हुई महिलाओं को काबुल के बाजार में बेच रहा था।
तब धर्म ने ताल ठोकी थी। धर्म निष्ठ वीरों ने सतत संघर्ष किया था। वह अत्याचार चल रहा है और उसका संहार चल रहा है।
मुलायम सिंह सोशलिस्ट सेक्युलर ने राम भक्तों को गोली मार कर क्या देखा ? ज्वाला भड़की या बुझ गयी?
गोली चलने के उपरांत बाबरी ध्वस्त हुई थी। हिन्दू दमित नहीं होता। राजशक्ति ने देखा उसकी औकात क्या है?
गोधरा की आगजनी हुई, प्रतिक्रिया में गुजरात दंगा हुआ। भगवा आतंक बताकर दमन का अभियान चला। उस आंवे में एक राजनीति पकने लगी।
भाजपा के राजकाल में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण की बाधाएँ दूर हुईं, मंदिर बना।
इस कार्य में राजोगुणी दंभ दोष आया, कुछ त्रुटियाँ हुईं। उसके झटके लगे। लेकिन और सब ठीक ही रहा।
जिन्होंने शिलान्यास समारोह की लाइव टेली कास्ट देखा हो, वे याद करें- उसमें पारिजात के पेड़ लगाने का प्रसंग आता है। उसमें मोदी जी और चंपत जी हैं। उस दृश्य को देखिए, विश्लेषित कीजिए, स्वयं समझिए, जितना समझ में आए। उसपर मैं क्यों बोलूँगा! काल देवता अपनी गति से चल रहे हैं।
अंतत: यही सिद्ध होने वाला है कि
अर्थशक्ति का नियामक धर्म है। राज के नियामक राम जी हैं।
जश्ने सैफई नहीं चलेगा, योगीराज ही चलेगा।
रिपोर्ट – जगदीश शुक्ला







