वाराणसी। दशाश्वमेध घाट मार्ग स्थित अत्यंत प्राचीन कामरूप मठ के पीठाधीश्वर महंत स्वामी शुद्धानंद तीर्थ महाराज ने पितृपक्ष के धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि सनातन धर्म में पितृपक्ष अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता, श्रद्धा और स्मरण का विशेष अवसर है। इस अवधि में विधि-विधान से पितरों का तर्पण, श्राद्ध एवं पिंडदान करने से परिवार में सुख-शांति और पूर्वजों के प्रति श्रद्धा की भावना मजबूत होती है।
महंत स्वामी शुद्धानंद तीर्थ महाराज ने बताया कि काशी को सनातन परंपरा में मोक्ष की नगरी माना गया है। यहां गंगा तट पर पितरों के निमित्त किया गया तर्पण और श्राद्ध विशेष फलदायी माना जाता है। काशी में पितृकर्म की परंपरा अत्यंत प्राचीन है और देश के विभिन्न क्षेत्रों से श्रद्धालु अपने पूर्वजों की आत्मिक शांति एवं मोक्ष की कामना लेकर यहां पहुंचते हैं।
उन्होंने पितृपक्ष पूजन के शुभारंभ की कथा का उल्लेख करते हुए कहा कि सनातन परंपरा में मनुष्य के जीवन में देवऋण, ऋषिऋण और पितृऋण का विशेष महत्व बताया गया है। पितरों के प्रति अपने दायित्वों का निर्वहन करना प्रत्येक व्यक्ति का धार्मिक कर्तव्य माना गया है। इसी भावना के साथ पितृपक्ष में श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान की परंपरा चली आ रही है।
महंत ने कहा कि पितृपक्ष केवल कर्मकांड का विषय नहीं, बल्कि अपनी जड़ों, परिवार की परंपरा और पूर्वजों के प्रति सम्मान व्यक्त करने का अवसर है। इस दौरान श्रद्धालुओं को श्रद्धा एवं शुद्ध भाव से पितरों का स्मरण करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि पितृपक्ष में अन्न, वस्त्र, जल, गौसेवा तथा जरूरतमंदों को दान करने का विशेष महत्व है। सामर्थ्य के अनुसार ब्राह्मण, साधु-संत एवं जरूरतमंद लोगों को भोजन कराना और दान-पुण्य करना पुण्यकारी माना गया है। उन्होंने लोगों से आडंबर से बचते हुए श्रद्धा, सेवा और सद्भाव के साथ पितृपक्ष मनाने का आह्वान किया।
महंत स्वामी शुद्धानंद तीर्थ महाराज ने कहा कि पितरों का स्मरण हमें अपने संस्कारों और सनातन परंपराओं से जोड़ता है तथा आने वाली पीढ़ियों को भी अपनी संस्कृति के प्रति जागरूक करता है।







