वाराणसी
उत्तर प्रदेश कलम की ताकत से सत्ता, प्रशासन और माफिया तक को आईना दिखाने वाले पत्रकार आज खुद दबाव और दमन के दौर से गुजर रहे हैं। ऐसे समय में पत्रकारों का संगठित होना बेहद जरूरी हो गया है।
पत्रकार अपनी कलम के माध्यम से किसी भी घटना, दुर्घटना और जनसमस्या को समाज व सरकार तक पहुंचाने का काम करता है। उसकी खबर व्यवस्था की कमियों को उजागर करती है और जिम्मेदारों को जवाबदेह बनने के लिए मजबूर करती है। लेकिन जब किसी खबर से माफिया, अधिकारी, नेता या पुलिस के संरक्षण में चल रही व्यवस्था की पोल खुलती है, तो पत्रकार पर दबाव बनाने के प्रयास शुरू हो जाते हैं।कहीं पत्रकार को थाने में बैठाने की कोशिश भी होती है, कहीं डराने-धमकाने का आरोप सामने आता है तो कहीं झूठे मुकदमों में फंसाकर आवाज दबाने के प्रयास किए जाते हैं। सवाल यह है कि आखिर पत्रकार अपनी सुरक्षा और स्वतंत्र पत्रकारिता के लिए किसके भरोसे रहे?
सबसे बड़ी कमजोरी—पत्रकारों का बिखराव!
पत्रकारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल बाहरी दबाव नहीं, बल्कि आपसी असंगठन भी है। जब पत्रकार एक-दूसरे की परेशानी में साथ खड़े नहीं होते, तो दबाव बनाने वालों का हौसला बढ़ता है।पत्रकारिता किसी एक व्यक्ति की ताकत नहीं, बल्कि लोकतंत्र की सामूहिक आवाज है। इसलिए पत्रकारों को छोटे-बड़े, नए-पुराने और अलग-अलग संस्थानों के नाम से ऊपर उठकर अपने अधिकार, सम्मान और स्वतंत्र पत्रकारिता के लिए एकजुट होना होगा।
आज सवाल सिर्फ एक पत्रकार का नहीं, पूरी पत्रकारिता के भविष्य का अगर आज किसी एक पत्रकार की आवाज दबाई जाती है और बाकी पत्रकार चुप रहते हैं, तो कल वही स्थिति किसी दूसरे पत्रकार के सामने भी खड़ी हो सकती है। इसलिए समय की मांग है कि पत्रकार एक-दूसरे के सुख-दुख में साथ खड़े हों, कानूनी और लोकतांत्रिक तरीके से आवाज उठाएं और पत्रकारिता की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए मजबूत संगठनात्मक एकता कायम करें।
क्योंकि कलम जब संगठित होती है तो उसकी आवाज व्यवस्था के सबसे ऊंचे दरवाजे तक पहुंचती है। पत्रकार जगत के लिए एक गंभीर चिंतन और एकजुटता की पुकार,सभी भाइयों पत्रकार बन्धुओ विनम्र आवाहन करता हूं, एक झूठ रहे, स्वस्थ रहे, सुरक्षित रहे।
हम आपके साथ हैं







