चन्दौली चहनिया
श्री रामलीला समिति रामगढ़ में चल रहे रामलीला में नौवें दिन लंका दहन रामलीला का मंचन किया गया इस दौरान भारी संख्या में पहुंचे श्रद्धालु जनों ने रावण लंका दहन का मंचन देखा।श्रीराम का कार्य करने की इच्छा से हनुमान स्वयं को मेघनाद के बंधन में स्वीकार कर रावण के समक्ष पहुंचते हैं। जहां रावण व हनुमान के बीच रोचक संवाद होता है। रावण के आदेश से हनुमान की पूंछ में तेल युक्त कपड़े बांधकर आग लगा देते हैं। हनुमान जी ने सोने की लंकापुरी को ही जला डालते हैं।
जब राम जी की सेना समुंद्र के किनारे पहुंच जाती है तो प्रभु श्री राम हनुमान जी को रावण को अंतिम चेतावनी व सीता जी का हाल जानने के लिए लंका भेजते हैं, जब हनुमान जी समुंद्र के ऊपर से जा रहे होते हैं तो आगे बढ़ने पर सुरसा नामक राक्षसी हनुमानजी का रास्ता रोक लेती है। अनुनय विनय के बाद भी बात न मानने पर सुरसा के मुख का फैलाव 32 योजन होते ही हनुमान जी सूक्ष्म रूप धर प्रवेश कर, बाहर आ जाते हैं। सुरसा उनकी बुद्धि की प्रशंसा करने के साथ ही रामकाज पूर्ण करने का आशीर्वाद देती है।
मच्छर रूप धारण कर लंका में प्रवेश करते ही सुरक्षा में तैनात लंकिनी उनका रास्ता रोकती है। उनके घूंसे के एक वार से ही लंकिनी मुख से खून उगल देती है। कुटिया से राम-राम की आवाज सुन हनुमान अंदर जाते हैं और सामने विभीषण को पाते हैं। ब्राह्मण वेष हनुमान का परिचय पाते ही विभीषण प्रणाम करते हैं। और माता सीता का पता बताते हैं। अशोक वाटिका पहुंचे हनुमान जी ने माता सीता को देख प्रभु श्री राम की अंगूठी देकर माता सीता को अपना परिचय देते हैं और प्रभु राम श्री राम का संदेश सुनते है और माता सीता पर रावण द्वारा किए जा रहे अत्याचार से व्यथित हो जाते हैं।
इसके बाद माता सीता का आज्ञा लेकर अशोक वाटिका में लगे कंद फल फूल खाने के समय उत्पात मचाने हुए राक्षसों का वध कर देते हैं हनुमान जी के तांडव से पूरी लंका में हड़कंप मच जाता है। इसकी सूचना मिलने पर रावण ने मेघनाथ को हनुमान जी को बंदी बनाकर दरबार में पेश करने का आदेश देता है। मेघनाथ हनुमान जी को बंदी बनाकर रावण के दरबार जब हनुमान जी को लाया जाता है वहां विभीषण ने हनुमान जी को मारने की बजाय उनकी पूछ में आग लगाने का सुझाव रावण को देते हैं ।तो अहंकारी रावण हनुमान जी की पूंछ में आग लगाने का आदेश देता है।
लेकिन पल भर में हनुमान जी रावण की लंका को जलाकर राख करते हैं। लंका जलाने के बाद हनुमान जी समुद्र के पास गए और उसमें कूद कर अपनी पूछ की आग बुझाने के बाद हनुमान जी ने एक बार फिर अशोक वाटिका गए और माता सीता से मिलकर उनकी कुशलता जानी माता सीता ने उन्हें अपनी एक पहचान चूड़ामणि और संदेश दिया संदेश लेकर माता सीता से विदा होकर हनुमान जी उसी समुद्र को पार कर वापस किष्किन्धा के पास ऋष्यमूक पर्वत में भगवान श्री राम लक्ष्मण और सुग्रीव के पास पहुंचे उन्होंने श्री राम के चरणों में मस्तक झुकाकर माता सीता का पूरा समाचार सुनते हुए माता सीता का चूड़ामणि भगवान श्री राम को सौंप दिया।
रिपोर्ट – अलीम हाशमी







