कमिश्नर से जगी आस या फिर वही डाक के तीन पात ?
राजधानी लखनऊ की फिज़ा में एक नया सवेरा हुआ है। आईपीएस तरुण गाबा ने पुलिस कमिश्नर की गद्दी संभाल ली है। हुक्मरानों के गलियारों में हलचल है, फाइलों के पन्ने पलट रहे हैं, और उम्मीदों के कल्पवृक्ष तले आम आदमी फिर से अपनी बंजर होती उम्मीदों को सींचने की फिराक में है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या यह महज चेहरों की अदला-बदली है, या इस मर्तबा व्यवस्था की सड़ांध को चीरकर कोई वास्तविक परिवर्तन देखने को मिलेगा?
राजधानी की चौखट पर भी वही पुराना, घिसा-पिटा नाटक बदस्तूर जारी है। यहाँ खाकी के नुमाइंदे जनता के सेवक कम और किसी सामंती रियासत के जागीरदार ज्यादा प्रतीत होते हैं। आम नागरिक जब अपनी विपदा की गठरी लेकर थानों की देहरी लांघता है, तो उसे न्याय की बूँद नसीब नहीं होती। विडम्बना देखिए कि जब पीड़ित हताश होकर न्याय की आस में कमिश्नर की दहलीज़ पर दस्तक देता है, तो उसे एक भव्य दीवार और दफ्तरी पेचीदगियों का सामना करना पड़ता है।
दरवाजे पर मुस्तैद संतरी का एक ही रटा-रटाया फरमान होता है, साहब बैठक में हैं! गनीमत है कि इस मुल्क के मुखिया, जो पूरे उत्तर प्रदेश के कुरुक्षेत्र को संभाल रहे हैं, वे भी जनता दरबार लगाकर फरियादियों की पीड़ा सुनते हैं। लेकिन लगता है कि राजधानी के इन छोटे-बड़े हुक्मरानों की व्यस्तता खुद सूबे के हुक्मरान से भी कई गुना विराट है। उनके पास फाइलों का बोझ है, अदालतों की पेशियां हैं, प्रशासनिक कामकाज हैं, बस नहीं है तो उस अकिंचन, शोषित और पीड़ित जनता के लिए दो पल जो अपनी बर्बादी की दास्तां सुनाने आई है।
कमिश्नर के आलीशान दफ्तर या वरिष्ठ अधिकारियों की चौखट पर जनता बड़ी ही अगाध उम्मीदों के साथ पहुंचती है। उसे यह भ्रम होता है कि यदि थाना स्तर पर उसकी अनदेखी हुई है, तो डीसीपी या एसीपी साहब इस प्रकरण की कोई विशेष और निष्पक्ष जांच करवाएंगे। लेकिन यहाँ आकर दूध का दूध और पानी का पानी होने की बजाय, न्याय का मज़ाक बनते देर नहीं लगती।
वरिष्ठ अधिकारी भी अपनी कलम की ताकत का इस्तेमाल करने के बजाय, अपने ही मातहत यानी उसी चौकी इंचार्ज या थानेदार की जुबान पर आँख मूंदकर भरोसा कर लेते हैं। एसीपी और डीसीपी साहबान बिना किसी स्वतंत्र पड़ताल के सीधे चौकी इंचार्ज की रिपोर्ट पर अपनी मुहर लगा देते हैं।
वाह रे प्रशासनिक न्याय! जब मामले की सत्यता का पैमाना वही चौकी इंचार्ज तय करेगा, जिसकी कार्यशैली पर खुद पीड़ित उंगलियां उठा रहा है, तो फिर वरिष्ठ अधिकारी के पास जाने का औचित्य ही क्या बचा? न्याय की इस विडम्बना को देखकर तो बस यही कहा जा सकता है, अब यह सही है या गलत, इसका तो निर्णय अब चौकी इंचार्ज साहब ही करेंगे!
इन साहिबान की तो पूछिए ही मत। वे तो आधुनिक युग के अदृश्य देवता बन चुके हैं, जो सिर्फ फाइलों की मूक दुनिया में निवास करते हैं। जनता से सीधा संवाद? तौबा-तौबा! यदि वे आम जनता के बीच उतर आएं, तो शायद उनके सफेदपोश रुतबे को ठेस पहुंच जाए। उन्हें लगता है कि जनता से संवाद करना उनकी शान के खिलाफ है, जबकि सच तो यह है कि जनता के बिना इस खाकी की हस्ती ही क्या है?
अब जब तरुण गाबा साहब ने लखनऊ की कमान अपने कंधों पर उठाई है, तो देखना यह है कि क्या वे इस दफ्तरशाही के कोहरे को भेद पाते हैं या नहीं। क्या वे हफ्ते में चंद घंटे निकालकर उस शोषित जनता के बीच बैठेंगे, जो अपराधियों के आतंक और पुलिस की उदासीनता की दो पाटों के बीच पिस रही है?
यदि वाकई में अपराधमुक्त उत्तर प्रदेश का सपना साकार करना है, तो पुलिस को जनता के दरबार में हाजिरी लगानी होगी न कि जनता को पुलिस के दर पर दम तोड़ना होगा। वरना कमिश्नर बदलते रहेंगे, गाड़ियाँ बदलती रहेंगी, सायरन की गूंज सुनाई देती रहेगी, लेकिन व्यवस्था के इस विशाल मरुस्थल में न्याय की तलाश करती जनता यूँही भटकती रहेगी और यह पूरा तंत्र महज़ डाक के तीन पात, बनकर रह जाएगा।
बहरहाल, नए कमिश्नर के आने से कार्यशैली और व्यवस्था में कुछ नई चीजों के बदलाव की उम्मीद जनता की आँखों में साफ झलक रही है। कमिश्नर बदलने के बाद शायद इस जर्जर सिस्टम में बहुत कुछ नया और सकारात्मक बदल जाएगा, फिलहाल, यह तो आने वाला वक्त ही तय करेगा।







