आप जानते हैं 1826 को 30 मई का दिन ही क्यू चुना गया था? इसलिए क्योंकि उस दिन महर्षि नारद जी की जयंती थी। उन्हीं नारद जी की जिन्हें हम प्रथम पत्रकार कहते हैं।
वाम पत्रकारिता ने कभी इन चीज़ों को सामने नही आने दिया। पर अब शायद हालात बदले। कथित धर्म निरपेक्षता के फैशन में हिन्दू सरोकारों से नफरत की हद तक उपेक्षा को ही पत्रकारिता कहा जाने लगा। ऐसा करते रहने वाले पेशेवर भी अब राष्ट्रवाद, संस्कृति और सनातन आदि का महत्व समझेंगे, ऐसी उम्मीद जगी है।
पत्रकारिता दिवस के इस मौक़े पर एक बड़ा दिन और है। बहुत बड़ा दिन। अभिव्यक्ति की सच्ची आज़ादी सुरक्षित रखने लगातार काम करते रहने के संकल्प का भी दिन है यह।
अभिव्यक्ति का मतलब केवल ‘मार्क़्स नाम जपना पराया माल अपना’ नही होता, इसे भी सिद्ध करने के लिये सतत मेहनत करते रहना होगा।







