चकिया चंदौली कभी हर घर-आंगन की रौनक मानी जाने वाली गौरैया अब धीरे-धीरे विलुप्ति की कगार पर पहुंचती जा रही है। एक समय था जब सुबह की शुरुआत गौरैया की चहचहाहट से होती थी, लेकिन आज बदलते परिवेश और आधुनिक जीवनशैली के कारण यह नन्ही चिड़िया नजरों से ओझल होती जा रही है।
गांवों और कस्बों में जहां कभी कच्चे घर, खुले आंगन और पेड़-पौधों की भरमार हुआ करती थी, वहीं अब पक्के मकानों और कंक्रीट के जंगलों ने उनकी जगह ले ली है। मोबाइल टावरों का बढ़ता जाल, कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग और प्राकृतिक आवास की कमी गौरैया के अस्तित्व के लिए बड़ा खतरा बन चुके हैं।
हालांकि, इस दिशा में जागरूकता बढ़ाने के प्रयास भी किए जा रहे हैं। स्कूलों और कॉलेजों में बच्चों को गौरैया के संरक्षण के प्रति जागरूक करने के लिए नकली घोंसले बनवाए जा रहे हैं। बच्चों को बताया जा रहा है कि कैसे छोटे-छोटे प्रयासों से इस पक्षी को बचाया जा सकता है।
पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि यदि समाज के लोग मिलकर पहल करें तो गौरैया को बचाया जा सकता है। घरों में दाना-पानी की व्यवस्था करना, पेड़-पौधे लगाना और कृत्रिम घोंसले लगाना जैसे कदम बेहद कारगर साबित हो सकते हैं।
अब जरूरत है कि हर व्यक्ति इस मुहिम से जुड़े और अपनी जिम्मेदारी समझते हुए इस नन्ही चिड़िया को विलुप्त होने से बचाने में योगदान दे। तभी आने वाली पीढ़ियां भी गौरैया की मधुर चहचहाहट सुन सकेंगी।
रिपोर्ट – अलीम हाशमी











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