वाराणसी।
शहर में निजी विद्यालयों की कार्यप्रणाली को लेकर अब बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। फीस में लगातार बढ़ोतरी, ड्रेस और किताबों के नाम पर जबरन खर्च और हर साल बदलते पाठ्यक्रम ने अभिभावकों की कमर तोड़ दी है। स्थानीय स्तर पर मिल रही शिकायतों ने शिक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता पर गंभीर चिंता पैदा कर दी है।
हर साल बदल रहा पाठ्यक्रम, बढ़ रहा खर्च
अभिभावकों का आरोप है कि कई स्कूलों में कक्षा 1 से 8 तक हर साल किताबें बदल दी जाती हैं। इससे पुराने सत्र की किताबें बेकार हो जाती हैं और अभिभावकों को हर बार नई किताबें खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ता है। यह सिलसिला बच्चों की पढ़ाई से ज्यादा अभिभावकों की जेब पर भारी पड़ रहा है।
यूनिफॉर्म में ‘फिक्स दुकान’ का खेल!
कई स्कूलों पर आरोप है कि वे यूनिफॉर्म केवल तय दुकानों से ही खरीदने का दबाव बनाते हैं। इससे कीमतों में पारदर्शिता खत्म हो जाती है और कमीशनखोरी की आशंका बढ़ती है। अभिभावकों का कहना है कि यह सीधा-सीधा आर्थिक शोषण है।
फीस वृद्धि और री-एडमिशन शुल्क से बढ़ी परेशानी
हर साल फीस बढ़ोतरी के साथ-साथ री-एडमिशन के नाम पर अतिरिक्त शुल्क वसूला जा रहा है। अभिभावकों का कहना है कि यह नियमों के खिलाफ है और आम परिवारों के लिए बच्चों की पढ़ाई जारी रखना मुश्किल होता जा रहा है।
नियमों की अनदेखी या मिलीभगत?
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि निजी स्कूलों में फीस और अन्य शुल्कों को लेकर सख्त नियमन और पारदर्शिता जरूरी है। अगर समय रहते इस पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो यह समस्या और गंभीर रूप ले सकती है।
अब सवाल यह है कि प्रशासन कब जागेगा और अभिभावकों को इस बढ़ते आर्थिक बोझ से राहत कब मिलेगी?











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