लखनऊ/अंबेडकरनगर। उत्तर प्रदेश में आम जनता की समस्याओं के त्वरित समाधान के लिए शासन और प्रशासन स्तर पर लगातार व्यवस्थाएं मजबूत करने के दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर कई बार अधिकारियों द्वारा फोन न उठाने अथवा संपर्क में उपलब्ध न होने की शिकायतें सामने आती रहती हैं। यही स्थिति अब आम नागरिकों के साथ-साथ पत्रकारों और जनप्रतिनिधियों के लिए भी बड़ी समस्या बनती जा रही है।
इसी मुद्दे को लेकर उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हरिमोहन दुबे ने गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में अधिकारी जनता, मीडिया और जनप्रतिनिधियों से संवाद बनाए रखने के लिए उत्तरदायी है यदि किसी महत्वपूर्ण परिस्थिति में जिम्मेदार अधिकारी का फोन ही नहीं उठता, तो समस्या के समाधान की प्रक्रिया प्रभावित होना स्वाभाविक है।
हरिमोहन दुबे का कहना है कि जिले से लेकर प्रदेश स्तर तक जिम्मेदार अधिकारियों के फोन न उठने की शिकायतों को सामान्य विषय मानकर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
कई बार पत्रकारों को किसी घटना की पुष्टि, प्रशासन का पक्ष जानने अथवा जनता से जुड़ी तत्काल सूचना प्राप्त करने के लिए अधिकारियों से संपर्क करना पड़ता है। इसी प्रकार जनप्रतिनिधियों को भी अपने क्षेत्र की गंभीर समस्याओं को अधिकारियों तक पहुंचाने के लिए संवाद की आवश्यकता होती है।
उन्होंने कहा कि यदि अधिकारी लगातार फोन नहीं उठाते या संपर्क करने के बावजूद जवाब नहीं मिलता, तो इससे आम जनता में यह संदेश जा सकता है कि उनकी समस्याओं को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है। हालांकि हर अधिकारी के लिए हर समय फोन उठाना संभव नहीं है, लेकिन महत्वपूर्ण और आपातकालीन मामलों में वैकल्पिक संपर्क व्यवस्था तथा समयबद्ध जवाब की व्यवस्था अवश्य होनी चाहिए।
वरिष्ठ पत्रकार ने कहा कि पत्रकार लोकतंत्र का महत्वपूर्ण स्तंभ हैं और उनका कार्य केवल समाचार प्रकाशित करना ही नहीं, बल्कि जनता और प्रशासन के बीच संवाद का माध्यम बनना भी है। किसी घटना, दुर्घटना, कानून-व्यवस्था की स्थिति या जनसमस्या के संबंध में प्रशासन का आधिकारिक पक्ष जानना पत्रकार की जिम्मेदारी का हिस्सा है। यदि संबंधित अधिकारी से संपर्क ही न हो पाए, तो खबर की निष्पक्षता और तथ्यात्मकता प्रभावित हो सकती है।
उन्होंने मुख्यमंत्री से मांग की कि प्रदेश के सभी जिलों में अधिकारियों की संचार व्यवस्था की समीक्षा कराई जाए। जिलाधिकारी, पुलिस अधीक्षक, मुख्य विकास अधिकारी, मुख्य चिकित्सा अधिकारी सहित अन्य प्रमुख अधिकारियों के कार्यालयों में ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि अधिकारी व्यस्त होने की स्थिति में भी उनके कार्यालय का अधिकृत कर्मचारी या पीआरओ आवश्यक संदेश दर्ज करे और महत्वपूर्ण मामलों में अधिकारी तक सूचना पहुंचाए।
हरिमोहन दुबे ने कहा कि केवल अधिकारियों को फोन उठाने के निर्देश देना पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए प्रत्येक विभाग में हेल्पलाइन, कंट्रोल रूम, अधिकृत व्हाट्सऐप नंबर और शिकायतों की ट्रैकिंग व्यवस्था को प्रभावी बनाया जाना चाहिए। यदि कोई अधिकारी बैठक या क्षेत्रीय भ्रमण में है, तो कॉल करने वाले व्यक्ति को कम से कम यह जानकारी मिल सके कि संबंधित अधिकारी से कब और किस माध्यम से संपर्क किया जा सकता है।
उन्होंने यह भी कहा कि मीडिया कर्मियों और जनप्रतिनिधियों के लिए अनावश्यक विशेषाधिकार की मांग नहीं की जा रही है, बल्कि संवाद की एक संस्थागत व्यवस्था बनाने की जरूरत है। अधिकारी और पत्रकार दोनों अपने-अपने दायित्वों का निर्वहन करते हुए जनता के हित में काम करते हैं। ऐसे में दोनों के बीच संवाद मजबूत होना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए आवश्यक है।
वरिष्ठ पत्रकार ने मुख्यमंत्री और शासन से आग्रह किया कि अधिकारियों के फोन न उठाने संबंधी शिकायतों को लेकर जिलावार समीक्षा कराई जाए तथा जहां लगातार लापरवाही की शिकायतें सत्य पाई जाएं वहां जिम्मेदारी तय की जाए। साथ ही अधिकारियों के कार्यभार और वास्तविक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए व्यावहारिक संचार प्रोटोकॉल बनाया जाए।
उन्होंने कहा कि “अधिकारी जनता से दूर नहीं, जनता के बीच दिखाई देने चाहिए। फोन उठाना ही प्रशासनिक जवाबदेही का पूरा प्रमाण नहीं है, लेकिन जरूरत के समय संवाद उपलब्ध होना सुशासन की बुनियादी आवश्यकता जरूर है।*
अब देखना होगा कि शासन इस गंभीर समस्या को कितनी गंभीरता से लेता है और क्या प्रदेश में अधिकारियों, मीडिया, जनप्रतिनिधियों तथा आम जनता के बीच प्रभावी संवाद स्थापित करने के लिए कोई ठोस व्यवस्था लागू की जाती है।







