अब तो हाल यह हो गया है कि किसी घटना की पूरी सच्चाई सामने आने से पहले ही लोग अपना-अपना एजेंडा लेकर मैदान में उतर जाते हैं।
किसी के गमछे का रंग देखकर निष्कर्ष निकाल दिया जाता है, किसी की जाति देखकर कहानी बदल दी जाती है, किसी का नाम देखकर अचानक चुप्पी छा जाती है। ऐसा लगता है कि कुछ लोगों के लिए अपराध से बड़ा मुद्दा उसका राजनीतिक इस्तेमाल है।
अगर कोई चीटिंग करता है तो पहले उसकी जाति खोजी जाती है। अगर कोई अपराध करता है तो पहले उसका धर्म, उसकी पहचान, उसकी गरीबी या उसका सामाजिक वर्ग चर्चा का विषय बन जाता है। सवाल यह है कि आखिर अपराधी की पहचान पहले क्यों और अपराध बाद में क्यों?
क्या कानून इस आधार पर चलेगा कि आरोपी किस जाति का है, किस धर्म का है, पुरुष है या महिला है, अमीर है या गरीब?
अगर ऐसा होगा तो न्याय का अर्थ ही खत्म हो जाएगा।
अपराधी की कोई जाति नहीं होती। अपराधी की कोई बिरादरी नहीं होती। अपराधी की कोई राजनीतिक पहचान कानून से ऊपर नहीं होनी चाहिए। जिसने अपराध किया है, उसकी जांच साक्ष्यों के आधार पर होनी चाहिए और सजा भी उसी आधार पर मिलनी चाहिए। लेकिन आज हालात ये है कि घटना से ज्यादा उसकी राजनीतिक पैकेजिंग पर







