भारत आज वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का संकल्प लेकर आगे बढ़ रहा है। एक शिक्षक, टूटती दीवारें और घटते सरकारी स्कूल – क्या शिक्षा के बिना 2047 का सपना पूरा होगा?
दुनिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में देश की प्रगति, डिजिटल क्रांति, अंतरिक्ष उपलब्धियां, आधारभूत ढांचे का विस्तार और वैश्विक मंच पर बढ़ता प्रभाव निश्चित रूप से गौरव का विषय हैं।
लेकिन इसी चमकदार तस्वीर के पीछे यदि हम सरकारी स्कूलों की ओर देखें तो एक दूसरा भारत दिखाई देता है- ऐसा भारत जहां हजारों बच्चे आज भी पर्याप्त शिक्षकों, सुरक्षित भवन, स्वच्छ पेयजल, शौचालय, बिजली और गुणवत्तापूर्ण शिक्षण के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
सवाल यह है कि जिस शिक्षा-व्यवस्था पर विकसित भारत की नींव रखी जानी है, उसकी बुनियाद ही कमजोर होगी तो 2047 का भारत कितना मजबूत होगा?
सरकारी आंकड़े इस चिंता को और गंभीर बनाते हैं। यूडीआईएसई प्लस 2024-25 के अनुसार देश में 1,04,125 स्कूल ऐसे हैं जहां केवल एक शिक्षक कार्यरत है और इन स्कूलों में करीब 33.77 लाख विद्यार्थी पढ़ते हैं। यानी एक शिक्षक को कई कक्षाओं, अनेक विषयों और प्रशासनिक जिम्मेदारियों के बीच बच्चों की शिक्षा संभालनी पड़ रही है।
विडंबना यह है कि उसी देश में हम विश्वस्तरीय विश्वविद्यालयों, आईआईटी, आईआईएम, मेडिकल संस्थानों और अत्याधुनिक शिक्षण परिसरों की चर्चा करते हैं, लेकिन गांव के उस बच्चे की ओर पर्याप्त ध्यान नहीं देते जो टूटी छत के नीचे बैठकर भविष्य के सपने देख रहा है। कहीं शिक्षक एक है और कक्षाएं पांच। कहीं विद्यालय भवन जर्जर है, कहीं पानी नहीं, कहीं शौचालय नहीं।
हाल के महीनों में उत्तर प्रदेश के अनेक जिलों में विद्यार्थियों को अधिक शिक्षक, बेहतर भोजन, पेयजल, पंखे और बुनियादी सुविधाओं की मांग को लेकर सड़कों पर उतरना पड़ा। फतेहपुर में तो लगभग एक हजार विद्यार्थियों ने जर्जर कक्षाओं, रिसती छतों और सुरक्षित पेयजल जैसी मूलभूत सुविधाओं के लिए प्रदर्शन किया।
यह स्थिति केवल किसी एक राज्य अथवा किसी एक सरकार की विफलता नहीं है। यह वर्षों से चली आ रही उस प्रशासनिक सोच का परिणाम है जिसमें शिक्षा को प्राथमिकता तो भाषणों में दी गई, लेकिन उसकी गुणवत्ता और जवाबदेही को शासन की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में स्थान नहीं मिला।
निश्चित रूप से तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक भी नहीं है। यूडीआईएसई प्लस के अनुसार 2024-25 में देश में कुल 14.71 लाख स्कूल, करीब 24.69 करोड़ विद्यार्थी और एक करोड़ से अधिक शिक्षक हैं। सरकारी स्कूलों की संख्या 10.13 लाख है, जबकि निजी मान्यता प्राप्त स्कूल करीब 3.40 लाख हैं। सरकार के आंकड़े यह भी बताते हैं कि एकल-शिक्षक स्कूलों की संख्या 2023-24 के 1,10,971 से घटकर 2024-25 में 1,04,125 हुई है और कंप्यूटर सुविधा वाले स्कूलों का अनुपात 57.2 प्रतिशत से बढ़कर 64.7 प्रतिशत हुआ है।
नीति आयोग की हालिया रिपोर्ट एक और महत्वपूर्ण तस्वीर सामने रखती है। 2014-15 में देश में 11.07 लाख सरकारी स्कूल थे, जो 2024-25 में घटकर 10.13 लाख रह गए। इसके विपरीत निजी मान्यता प्राप्त स्कूलों की संख्या 2.88 लाख से बढ़कर 3.39 लाख हो गई। यह परिवर्तन केवल स्कूलों की संख्या का उतार-चढ़ाव नहीं है, यह अभिभावकों की बदलती पसंद और सरकारी शिक्षा में घटते विश्वास का संकेत भी है।
सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि जब सरकार के पास भवन है, जमीन है, प्रशिक्षित शिक्षक हैं, वेतन देने की क्षमता है और विशाल प्रशासनिक तंत्र है, तब सरकारी स्कूल निजी स्कूलों से पीछे क्यों हैं?
एसीईआर के आंकड़े भी इस अंतर को रेखांकित करते हैं। नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार 2024 में कक्षा 3 के बच्चों में कक्षा 2 स्तर का पाठ पढ़ पाने वालों का अनुपात सरकारी स्कूलों में 23.4 प्रतिशत था, जबकि निजी स्कूलों में 35.5 प्रतिशत। कक्षा 5 में भी सरकारी स्कूलों का आंकड़ा 44.8 प्रतिशत और निजी स्कूलों का 59.3 प्रतिशत रहा। यानी समस्या केवल स्कूल भवन की नहीं, सीखने के परिणामों की भी है।
इसी के समानांतर उच्च शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं की तस्वीर भी चिंता पैदा करती है। पेपर लीक, परीक्षा में अनियमितता, भर्ती में देरी और युवाओं के आंदोलनों की खबरें लगातार सामने आती रही हैं। 2026 में परीक्षा संबंधी विवादों ने विद्यार्थियों और अभ्यर्थियों में असंतोष को व्यापक बनाया।
सरकारी स्कूल वास्तव में भारत की सामाजिक समानता का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम हैं। इन स्कूलों में ग्रामीण परिवारों, श्रमिकों, गरीबों, वंचित वर्गों और निम्न आय वाले परिवारों के बच्चे बड़ी संख्या में पढ़ते हैं। यदि इन विद्यालयों की गुणवत्ता गिरती है तो सबसे अधिक नुकसान उसी वर्ग को होता है जिसके पास महंगे निजी स्कूलों का विकल्प नहीं है। इसलिए सरकारी स्कूलों की बदहाली केवल शिक्षा का संकट नहीं, सामाजिक न्याय का संकट भी है।
यहां एक कठोर लेकिन सार्थक सुझाव पर विचार होना चाहिए-क्या जनप्रतिनिधियों और वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों के बच्चों के लिए कुछ निश्चित परिस्थितियों में सरकारी स्कूलों में शिक्षा को प्रोत्साहित अथवा अनिवार्य करने जैसी व्यवस्था बनाई जा सकती है?
सरकार को अब घोषणाओं से आगे बढ़कर ‘राष्ट्रीय सरकारी स्कूल कायाकल्प मिशन’ जैसी व्यापक पहल पर विचार करना चाहिए। प्रत्येक स्कूल के लिए शिक्षक उपलब्धता, भवन की सुरक्षा, पेयजल, बिजली, डिजिटल सुविधा, शौचालय, पुस्तकालय, खेल मैदान और सीखने के परिणामों के स्पष्ट मानक तय हों। हर स्कूल का सार्वजनिक डैशबोर्ड हो और हर वर्ष यह बताया जाए कि कितने बच्चे पढ़ना, लिखना और गणित करना सीख पाए।
सबसे जरूरी है कि शिक्षा को राजनीति से ऊपर उठाया जाए। सरकार और विपक्ष दोनों को यह समझना होगा कि सरकारी स्कूल किसी पार्टी के नहीं, भारत के भविष्य के स्कूल हैं।
लेखक: प्रोफेसर राहुल सिंह
अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश वाणिज्य परिषद
रिपोर्ट – सुनील सिंह राजपूत







