एक छोटा सा किस्सा है द्वापर युग का। एक त्रिकालदर्शी साधु सबका भविष्य बता देते थे। उनका मजाक उड़ाने के लिए कुछ लौंडों ने पप्पू यादव जैसा ही मखौल किया। स्त्री का रूप धरा। पेट पर लोहे-कपड़े आदि बांध कर उसे ऊंचा किया। साधु से पूछने गया कि इस ‘महिला’ को बेटा होगा या बेटी?
साधु समझ गए कि उनका उपहास किया जा रहा है। गुस्सा आ गया उन्हें और शाप दिया कि न बेटा न बेटी। इसके पेट से जो निकलेगा, उससे तुम्हारे सारे खानदान का सफाया हो जाएगा। निर्वंश हो जाएगी तुम्हारी नस्ल ही।
आगे का वृत्तांत आपको पता ही है। उसी कुल में श्रीकृष्ण पले-बढ़े, फिर भी साधु के शाप का प्रभाव खत्म नहीं कर पाये। यदुवंश का सफाया हो गया। पप्पू का यादव होना महज़ संयोग है। वैसे भी अब जातिगत या वंशानुगत व्यवस्था वैसी नहीं है, जिसमें किसी एक घटना से सम्पूर्ण जाति को जोड़ दिया जाये। सो, यह जातिगत बात बिल्कुल नहीं है। किंतु ..
किंतु यह कहने में हमें कोई गुरेज नहीं है कि जिस तरह का कृत्य आज दोनों पप्पुओं ने किया है, उसका प्राकृतिक दंड तो मिलेगा ही। नैसर्गिक न्याय हो कर रहेगा। शायद हम सब देखेंगे इन्हें सजा मिलते हुए। लाजिम है देखेंगे।
हे ईश्वर! इन्हें बिल्कुल भी क्षमा मत करना। इन्हें पता है कि ये क्या कर रहे थे। समस्त सनातन समाज को अपमानित कर खून के आसूं रुलाने वाले इन दोनों पप्पुओं के विरुद्ध हुए ‘न्याय’ देखने की प्रतीक्षा रहेगी।











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