इलाहाबाद
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि सिर्फ संयुक्त हिंदू परिवार का हिस्सा होने से ही उसके किसी सदस्य द्वारा अलग से खरीदी गई संपत्ति अपने-आप संयुक्त परिवार की संपत्ति नहीं बन जाती। सदस्य अपने नाम पर अलग से संपत्ति खरीद सकते हैं। परिवार के दूसरे सदस्य उस पर तब तक अपना हक नहीं जता सकते जब तक कि वे यह साबित न कर दें कि वह संपत्ति संयुक्त परिवार के पैसे से खरीदी गई थी।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस चंद्र कुमार राय की सिंगल बेंच ने यह फैसला सुनाया है। उन्होंने बस्ती जिले के निवासी परदेशी की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह फैसला दिया। जस्टिस राय ने उप संचालक चकबंदी, यानी डिप्टी डायरेक्टर ऑफ कंसोलिडेशन (DDC) की ओर से 17 अगस्त 1979 को जारी किया गया आदेश रद्द कर दिया। इसके साथ उन्होंने 29 दिसंबर 1978 के अपीलीय आदेश को बहाल कर दिया।
यह मामला खलीलाबाद तहसील, जिसे अब संत कबीरनगर के नाम से जाना जाता है, के बारो गांव के तीन भूखंडों से जुड़ा है। जब चकबंदी की शुरुआत हुई तब यह जमीन सिर्फ याचिकाकर्ता परदेशी के पिता चेताई के नाम से दर्ज थी। बाद में उनके भाई जगलाल और फौजदार ने उत्तर प्रदेश चकबंदी अधिनियम के अंतर्गत आपत्ति दर्ज कराई और खुद को सह काश्तकार की हैसियत से दर्ज करने की मांग की। दोनों भाइयों ने दावा किया कि वह जमीन मूल रूप से परिवार की संयुक्त संपत्ति थी।







