यह तस्वीर भी मेरे लिए ऐसी ही एक स्मृति है। वाघा बॉर्डर पर मेरे साथ खींची गई यह तस्वीर केवल चार पत्रकारों राजीव सिंह जी (डिजिटल एडिटर-अमर उजाला), श्री यशवंत सिंह जी (संपादक भड़ास मीडिया) और श्री राजेश जेटली (प्रसिद्ध डिजाइनर) की तस्वीर नहीं, बल्कि उस दौर की गवाही है जब पत्रकारिता नए भूगोल तलाश रही थी और हम अपने सपनों के साथ नई राहों पर निकल पड़े थे।
सन् 1999 जब अमर उजाला पंजाब की धरती पर अपने कदम बढ़ा रहा था। जालंधर संस्करण के शुभारंभ की तैयारियों के बीच हमें वाघा बॉर्डर जाने का अवसर मिला। वहां पहुंचकर पहली बार महसूस हुआ कि सरहदें नक्शों पर खींची जाती हैं, लेकिन इंसानी भावनाओं पर नहीं।
वाघा बॉर्डर पर खड़े होकर सामने पाकिस्तान को देखना एक अलग ही अनुभव था। दोनों ओर सैनिक थे, झंडे थे, सुरक्षा थी, लेकिन उन सबके बीच कुछ और भी था-लोगों की आंखों में छिपी उत्सुकता, अपनापन और एक अनकहा संवाद।
ऐसा लगता था मानो दोनों तरफ के लोग एक-दूसरे से कहना चाहते हों—
“हम अलग मुल्कों में रहते हैं, लेकिन हमारी कहानियां, हमारी यादें और हमारे जज्बात कहीं न कहीं एक जैसे हैं।” उस दिन मुझे लगा कि शब्दों की भी सीमाएं होती हैं, लेकिन निगाहों की नहीं। आंखें वह सब कह देती हैं, जिसे भाषा कभी-कभी कह नहीं पाती।
आज बरसों बाद जब इस तस्वीर को देखता हूं तो लगता है
कि तस्वीर में कैद मुस्कानें समय के साथ पुरानी नहीं हुईं। पुराना हुआ है सिर्फ वह दौर, लेकिन दोस्तियां, यादें और सरहद के उस पार झांकती हुई इंसानियत आज भी वैसी ही है कभी-कभी मुल्क पीछे छूट जाते हैं, लेकिन इंसान और उनकी आंखों में बसे रिश्ते हमेशा साथ चलते हैं।







