महमूद मदनी और अर्शद मदनी के हालिया वक्तव्यों को अलग-अलग सुनकर छोड़ देना उचित नहीं होगा। एक ओर समान नागरिक संहिता के विरुद्ध शरीयती नियमों को अपरिवर्तनीय बताने का आग्रह है; दूसरी ओर भारत की वर्तमान परिस्थितियों पर टिप्पणी करते हुए सोवियत संघ के विघटन की मिसाल दी जा रही है।
मेरी दृष्टि में इन वक्तव्यों और प्रस्तावों में इस्लामी सर्वाधिकारवादी,श्रेष्ठतावादी, वर्चस्ववादी और प्रभुत्ववादी विचारधारा का राजनीतिक स्वर दिखाई देता है। इनकी गंभीर समीक्षा आवश्यक है।
पहले महमूद मदनी का बयान देखिए।
30–31 अक्टूबर 2026 को नूँह, मेवात, हरियाणा में आयोजित जमीयत उलमा-ए-हिंद के अधिवेशन में महमूद मदनी ने अवैध घुसपैठ रोकने की जिम्मेदारी को लेकर गृह मंत्री अमित शाह पर हमला किया। समाचारों के अनुसार, उन्होंने विदेशियों का अवैध प्रवेश रोकने में नाकामी की शर्त जोड़ते हुए कहा—“आपसे बड़ा गद्दार इस मुल्क में कोई नहीं है।” उन्होंने अवैध प्रवेश करने वालों को वापस भेजने की बात भी कही।
मौलाना! सरकार से जवाब माँगिए, उसकी विफलताओं की आलोचना कीजिए। लेकिन प्रशासनिक विफलता का आरोप लगाकर सीधे “गद्दार” का प्रमाणपत्र बाँटने का अधिकार आपको किसने दिया? गृह मंत्री पर देश से गद्दारी करने का आरोप सिद्ध करने के लिए प्रमाण चाहिए—मंच से उछाला गया विशेषण पर्याप्त नहीं है।
आप अवैध घुसपैठ के विरोध में हैं, तो इस घोषणा की कसौटी व्यवहार होगा। निष्पक्ष जाँच में कोई अवैध निवासी पाया जाए, तो उसके विरुद्ध विधिसम्मत कार्रवाई का समर्थन कीजिए। निर्दोष भारतीय नागरिक की रक्षा भी हो और प्रमाणित अवैध निवासी पर कार्रवाई भी। किसी व्यक्ति की मज़हबी पहचान उसके लिए कानून से छूट नहीं बन सकती।
इसी अधिवेशन का शरीयती आग्रह भी देखिए।
यूसीसी के विरोध में प्रस्ताव का तर्क था कि विवाह, तलाक और विरासत के इस्लामी नियम क़ुरान–हदीस से निर्धारित दैवी निर्देश हैं, जिनका पालन मुसलमानों का दीनी दायित्व है। इसलिए उनमें हस्तक्षेप स्वीकार नहीं किया जा सकता। इसी बिन्दु पर समन्वय और सामंजस्य के सभी मार्ग बंद हो जाते हैं,संविधान इस्लामी मतवादियों के समक्ष अनुपयोगी और प्रभाव हीन हो जाता है।
यहीं मेरा मूल प्रश्न है: नागरिक अधिकारों के लिए संविधान का सहारा, लेकिन पारिवारिक विधान की समीक्षा के सामने क़ुरआनी अल्लाह की तथाकथित अपरिवर्तनीयता की दीवार—यह कैसी व्यवस्था की माँग है ?
मेरी दृष्टि में सार्वजनिक जीवन के भीतर शरीयती अपवादों को स्थायी बनाने का संगठित हठी राजनीतिक दबाव इस्लामीकरण की दिशा में एक चरण है। समान नागरिकता की चर्चा में किसी मज़हबी विधान को आलोचना और सुधार से ऊपर रखने की माँग को भारत जैसी पंथनिरपेक्ष संवैधानिक व्यवस्था में कभी स्वीकार नहीं किया जा सकता।
अब अर्शद मदनी का बयान देखिए।
27 अक्टूबर 2026 को दारुल उलूम देवबंद, सहारनपुर की मस्जिद रशीद में आयोजित कुल हिंद राब्ता-ए-मदारिस-ए-इस्लामिया अरबिया के सम्मेलन में अर्शद मदनी ने सोवियत संघ का उदाहरण दिया। समाचार के अनुसार, उनका कहना था कि वहाँ इस्लाम और उसके प्रतीकों को दबाने की कोशिश हुई, लेकिन ईमान नहीं मिटा; सोवियत संघ बिखर गया और उससे स्वतंत्र हुए कई देशों में आज मस्जिदें आबाद हैं।
मौलाना से प्रश्न है: भारत की परिस्थितियों पर बोलते समय किसी दूसरे राष्ट्र के इस्लामिक कारणों से विघटन की मिसाल देने का प्रयोजन क्या है? आस्था के स्थायित्व की बात में देश के बिखरने को जोड़कर श्रोताओं को क्या संदेश दिया जा रहा है?
मेरी दृष्टि में यह तुलना अशुभ राजनीतिक संकेत देती है। उपलब्ध समाचार में भारत को तोड़ने की स्पष्ट घोषणा दर्ज नहीं है; लेकिन उनके चुने हुए उदाहरण के निहितार्थों पर प्रश्न उठाना आवश्यक है।
इतिहास भी स्पष्ट रहे: सोवियत संघ का विघटन राजनीतिक, आर्थिक और विभिन्न गणराज्यों के राष्ट्रवादी आंदोलनों से जुड़ी जटिल घटना थी। उसे इस्लाम की विजय-कथा बनाना इतिहास का सरलीकरण और थोथी इस्लामी आत्मप्रवंचना के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है।
गद्दारी का ठप्पा दूसरों पर लगाने वाले नेतृत्व को अपनी भाषा की जवाबदेही भी स्वीकार करनी होगी। राष्ट्र की एकता के प्रति प्रतिबद्धता स्पष्ट कीजिए। समान नागरिक अधिकारों के साथ समान जवाबदेही स्वीकार कीजिए। अपने मज़हबी विधान को सार्वजनिक समीक्षा से ऊपर रखने का आग्रह छोड़िए।
इन वक्तव्यों को सामान्य बयानबाज़ी मानकर भुला देना भूल होगी। इनकी तथ्याधारित समीक्षा हो और इनसे उठने वाले प्रश्नों का स्पष्ट उत्तर माँगा जाए।
भारत की नागरिक व्यवस्था की दिशा सार्वजनिक विवेक से तय होगी—मज़हबी दबाव से नहीं।
यतो धर्मस्ततो जयः।
सदा विराजतां सनातनधर्मः॥ Sushil Seth से साभार







