चकिया शहाबगंज (चंदौली)
स्वच्छता के नाम पर सरकार का खजाना खाली हो रहा है, लेकिन जमीन पर ग्रामीणों की किस्मत में आज भी ‘लोटा’ और ‘झाड़ी’ ही लिखी है। शहाबगंज ब्लॉक के ग्राम सभा मंगरौर में बना सामुदायिक शौचालय इसका जीता-जागता उदाहरण है—जहाँ लाखों रुपये खर्च कर खड़ी की गई इमारत अब सिर्फ एक ‘शो-पीस’ और भ्रष्टाचार का स्मारक बन कर रह गई है।
लाखों रुपये खर्च होने के बाद भी शौचालय के दरवाजे पर लटका ताला ग्रामीणों को मुंह चिढ़ा रहा है। आलम यह है कि सरकारी फाइलों में गांव को स्वच्छता का तमगा बांट दिया गया, लेकिन हकीकत में महिलाएं, बुजुर्ग और बच्चे आज भी खुले में शौच जाने को विवश हैं।
एडीओ पंचायत की नींद कब खुलेगी?
ग्रामीणों का आरोप है कि इस बदहाली की बार-बार गुहार लगाने के बावजूद शहाबगंज के एडीओ पंचायत कुंभकर्णी नींद सो रहे हैं। शिकायतें आती हैं, फाइलें सरकती हैं, लेकिन ताला खोलने की फुर्सत किसी अधिकारी को नहीं है। सवाल यह उठता है कि:
जब शौचालय में ताला ही बंद रखना था, तो लाखों रुपये का सरकारी धन किसके पेट में गया?
सफाई कर्मचारी और देखरेख के नाम पर हर महीने उठने वाला बजट किसकी जेब में जा रहा है?
क्या उच्च अधिकारियों की शह पर एडीओ पंचायत जनता की समस्याओं पर आंखें मूंदे बैठे हैं?
जनाक्रोश उफान पर, कार्रवाई नहीं तो उग्र आंदोलन
गांव के ग्रामीणों का आक्रोश अब चरम पर है। लोगों का कहना है कि अधिकारी सिर्फ दफ्तरों में बैठकर ऑल-इज-वेल का रिपोर्ट कार्ड बनाते हैं, जबकि जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द से जल्द शौचालय का ताला खुलवाकर इसे जनसामान्य के लिए चालू नहीं किया गया और जिम्मेदार कर्मचारियों पर कार्रवाई नहीं हुई, तो वे तहसील और ब्लॉक मुख्यालय का घेराव करने से पीछे नहीं हटेंगे।
अब देखना यह है कि इस खबर के बाद जिला प्रशासन की नींद टूटती है या मंगरौर के लोग यूं ही प्रशासनिक अनदेखी का शिकार होते रहेंगे।







