चकिया/चंदौली
ग्रामीण अंचलों में सुलभ और सुरक्षित स्वास्थ्य सेवाएं देने के सरकारी दावों को चिढ़ाता एक मामला सैदूपुर बाजार से सामने आया है। यहां संचालित ‘एसके डेंटल क्लिनिक’ की कार्यप्रणाली को लेकर स्थानीय नागरिकों और शिकायतकर्ताओं ने मोर्चा खोल दिया है।
क्लिनिक के संचालन की वैधानिकता, बायो-मेडिकल वेस्ट के निस्तारण, चिकित्सकीय अर्हता और उपकरणों के स्टेरिलाइजेशन (संक्रमण मुक्तीकरण) को लेकर गंभीर अनियमितताओं का आरोप लगाते हुए स्वास्थ्य विभाग से स्थलीय जांच की मांग की गई है।
लेकिन इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यह उठ रहा है कि आखिर स्वास्थ्य महकमा अब तक मौन क्यों है? सूत्रों की मानें तो सत्ता पक्ष से जुड़े एक माननीय/जनप्रतिनिधि इस बिना मानक चल रहे क्लिनिक के संचालक के पक्ष में खुलकर ढाल बन खड़े हुए हैं।
चर्चा है कि विभाग की कोई भी टीम जब कार्रवाई का मन बनाती है, तभी ‘नेताजी’ का फोन अधिकारियों के मोबाइल पर बज उठता है। ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि क्या स्वास्थ्य विभाग की कलम सत्ता के रसूख के आगे कुंद पड़ चुकी है, या फिर मरीजों की जान से ज्यादा कीमती नेताजी की रजामंदी है?
जानलेवा हो सकती है यह लापरवाही: संक्रमण का भारी खतरा
दंत चिकित्सा की प्रक्रिया अत्यंत संवेदनशील होती है। इसमें प्रयुक्त होने वाले उपकरण सीधे तौर पर मरीजों की लार और खून के संपर्क में आते हैं। यदि प्रत्येक मरीज के इस्तेमाल के बाद उपकरणों को ऑटोक्लेव (Autoclave) मशीन में रखकर वैज्ञानिक मानकों के अनुसार स्टेरलाइज न किया जाए, तो हेपेटाइटिस-बी, सी, एचआईवी और गंभीर बैक्टीरियल इंफेक्शन एक मरीज से दूसरे मरीज में फैलने का सीधा खतरा बना रहता है। शिकायतकर्ताओं का सीधा आरोप है कि क्लिनिक में इस बेहद जरूरी प्रक्रिया की खुलेआम अनदेखी की जा रही है।
डिग्री असली या फर्जी? पंजीकरण पर भी गहराया सस्पेंस
शिकायतकर्ताओं ने मांग की है कि स्वास्थ्य विभाग केवल कागजी दावों पर न जाकर निम्नलिखित बिंदुओं पर निष्पक्ष जांच करे:
चिकित्सक की योग्यता: क्लिनिक में उपचार कर रहे व्यक्ति की BDS/MDS डिग्री और राज्य डेंटल काउंसिल में उनके सक्रिय/वैध पंजीकरण (Registration) का भौतिक सत्यापन हो।
क्लीनिकल एस्टैब्लिशमेंट एक्ट: क्या क्लिनिक के पास मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) कार्यालय से निर्गत क्लिनिक संचालन का वैध लाइसेंस मौजूद है?
अनधिकृत अभ्यास: कहीं कोई बिना अर्हता वाला व्यक्ति डॉक्टर का बोर्ड लगाकर सीधे-साधे ग्रामीणों की सेहत और गाढ़ी कमाई पर डाका तो नहीं डाल रहा?
बायो-मेडिकल वेस्ट का अवैध निस्तारण: महामारी को न्योता
संक्रमित सुइयां, इस्तेमाल की गई सीरिंग, खून से सने कॉटन और डिस्पोजेबल ग्लव्स के सुरक्षित निस्तारण को लेकर सख्त नियम बने हुए हैं। बायो-मेडिकल वेस्ट को निर्धारित नियमानुसार अधिकृत एजेंसी के माध्यम से ही नष्ट किया जाना अनिवार्य है। क्लिनिक पर आरोप है कि यहां इन खतरनाक जैविक कचरों को खुले में फेंका जा रहा है, जो स्थानीय आबादी और राहगीरों के लिए गंभीर संक्रमण का सबब बन सकता है।
क्या रसूख पर भारी पड़ेगा कानून?
हालांकि इन तमाम संगीन आरोपों की वैधानिक पुष्टि तो मुख्य चिकित्सा अधिकारी और जिला स्वास्थ्य टीम के औचक निरीक्षण और दस्तावेजों की जांच के बाद ही हो पाएगी। लेकिन जिस तरह कागजों में सब कुछ दुरुस्त दिखाकर धरातल पर नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं, उसने पूरे तंत्र को कठघरे में खड़ा कर दिया है।
क्षेत्र की जनता अब टकटकी लगाए देख रही है कि क्या चंदौली स्वास्थ्य प्रशासन और चकिया के प्रशासनिक अधिकारी सत्ता के संरक्षण में चल रहे इस खेल पर नकेल कसेंगे, या फिर किसी बड़े हादसे के इंतजार में फाइलों पर धूल जमने देंगे।







