राष्ट्रीय राजमार्गों और खेतों के लिए नासूर बने छुट्टा पशु: किसानों की बर्बादी और बढ़ती दुर्घटनाओं की विस्तृत रिपोर्ट

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देशभर में छूट्टा (आवारा) पशुओं की समस्या अब केवल एक स्थानीय मुद्दा नहीं रह गई है, बल्कि यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था, किसानों की आजीविका और राष्ट्रीय सुरक्षा (यातायात सुरक्षा) के लिए एक विकराल संकट का रूप ले चुकी है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, बिहार और हरियाणा सहित कई राज्यों में खेतों से लेकर नेशनल हाईवे (NH) तक इन पशुओं का आतंक चरम पर है।

1. खेतों में तबाही: अन्नदाता की मेहनत पर फिर रहा पानी
ग्रामीण इलाकों में किसानों के लिए छूट्टा पशु सबसे बड़ा सिरदर्द बन गए हैं। रातभर जागकर फसल की रखवाली करना किसानों की मजबूरी बन गया है।फसलों का नुकसान: गोवंश और अन्य आवारा पशु झुंडों में खेतों में घुसकर गेंहू, धान, सरसों और सब्जियों की लहलहाती फसलों को रौंद रहे हैं और चट कर रहे हैं।

* आर्थिक मार: एक बार खेत में पशुओं का झुंड घुस जाए तो महीनों की मेहनत कुछ ही घंटों में बर्बाद हो जाती है। खाद, बीज और सिंचाई पर कर्ज लेकर खर्च करने वाला किसान बर्बादी के कगार पर पहुंच रहा है।

* रात्री जागरण और संघर्ष: किसान कड़ाके की ठंड, बारिश और गर्मी की परवाह किए बिना खेतों में मचान बनाकर सोने को मजबूर हैं। कई बार पशुओं को भगाने के चक्कर में किसानों और मवेशियों के बीच संघर्ष में किसान घायल भी हो जाते हैं।

2. राष्ट्रीय राजमार्गों पर मौत का तांडव: हादसों का बढ़ता ग्राफ
शहरों से लेकर गांवों को जोड़ने वाले राष्ट्रीय राजमार्गों (National Highways) पर छूट्टा पशुओं का डेरा आम बात हो गई है, जो सड़क हादसों का एक प्रमुख कारण बन रहा है।

* अंधेरे में अदृश्य खतरे: रात के समय तेज रफ्तार वाहनों के सामने अचानक आवारा पशुओं के आ जाने से गंभीर सड़क दुर्घटनाएं हो रही हैं। कई बार हाईवे पर बैठे या सोते हुए पशु ड्राइवरों को दिखाई नहीं देते।

* जान-माल की क्षति: इन हादसों में न केवल दुधारू और बेसहारा पशुओं की दर्दनाक मौत हो रही है, बल्कि वाहन चालकों और यात्रियों की भी जान जा रही है। कई परिवार इन हादसों के कारण अपनों को खो चुके हैं या आजीवन विकलांगता का शिकार हो चुके हैं।

* यातायात बाधित: एक्सप्रेस-वे और नेशनल हाईवे पर अचानक पशुओं के आ जाने से ट्रैफिक जाम की समस्या भी उत्पन्न होती है, जिससे राष्ट्रीय संपत्ति और समय दोनों का नुकसान होता है।

3. समस्या के मुख्य कारण
* गोवंश का परित्याग: दूध देना बंद करने या नर बछड़े होने के बाद पशुपालकों द्वारा उन्हें खुला छोड़ देना।

* गोवंश आश्रय स्थलों (गौशालाओं) की लचर स्थिति: कागजों में संचालित कई गौशालाओं में चारे-पानी की भारी कमी और भ्रष्टाचार के कारण पशु वहां टिक नहीं पाते और बाहर निकल आते हैं।

* बढ़ती संख्या: प्रभावी जन्म नियंत्रण कार्यक्रमों (जैसे बधियाकरण) की कमी के कारण आवारा पशुओं की संख्या तेजी से बढ़ रही है।
4. समाधान और आवश्यक कदम
इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए प्रशासन और समाज दोनों को मिलकर ठोस कदम उठाने होंगे:
* सख्त टैगिंग और जिम्मेदारी: पशु पालने वालों के लिए आधार या टैगिंग प्रणाली को अनिवार्य किया जाए, ताकि जो लोग अपने पशुओं को आवारा छोड़ते हैं, उन पर भारी जुर्माना लगाया जा सके।

* गौशालाओं का सुदृढ़ीकरण: ग्रामीण और शहरी स्तर पर बनी गौशालाओं में चारे, पानी और पशु चिकित्सा की पुख्ता व्यवस्था हो ताकि पशुओं को अंदर ही रखा जा सके।

* हाईवे सुरक्षा: राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) और स्थानीय प्रशासन को मिलकर हाईवे के दोनों ओर फेंसिंग (बाड़ लगाना) या रिफ्लेक्टिव कॉलर बेल्ट पहनाने की व्यवस्था करनी चाहिए ताकि रात में दूर से ही पशु दिखाई दे सकें।

* सामूहिक सहभागिता: गांवों में ‘चारा बैंक’ और स्थानीय समितियों का गठन कर किसानों को राहत देने के प्रयास किए जाने चाहिए।

 

रिपोर्ट भोलानाथ यादव

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