नई दिल्ली
देशभर में पत्रकारिता के क्षेत्र से जुड़े उन हजारों पत्रकार साथियों की स्थिति आज भी चिंता का विषय है। जो बिना नियमित वेतन और सीमित संसाधनों के बावजूद लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की जिम्मेदारी पूरी निष्ठा से निभा रहे हैं। शासन-प्रशासन से लेकर आम जनता और जनप्रतिनिधियों तक की आवाज को समाज के सामने लाने वाला पत्रकार स्वयं संकट की घड़ी में कई बार अकेला पड़ जाता है।
इसी गंभीर विषय को लेकर राष्ट्रीय पत्रकार सुरक्षा आयोग के राष्ट्रीय अध्यक्ष विशेष सलाहकार सुरेश कुमार शर्मा ने देश के पत्रकार समाज से एक भावनात्मक और महत्वपूर्ण अपील की है।
उन्होंने कहा कि पत्रकार का काम केवल समाचार लिखना नहीं है। वह अपनी जान की परवाह किए बिना दुर्घटना, अपराध, प्राकृतिक आपदा, प्रशासनिक कार्रवाई और जनसमस्याओं के बीच पहुंचकर सच्चाई को सामने लाता है। लेकिन जब वही पत्रकार या उसके परिवार पर कोई बीमारी, दुर्घटना, आर्थिक संकट अथवा कोई अप्रिय घटना आती है। तब कई बार पत्रकारों के बीच भी बड़ा-छोटा और प्रतिष्ठित-अप्रतिष्ठित का अंतर दिखाई देने लगता है।
सुरेश कुमार शर्मा ने कहा जिस पत्रकार की कलम समाज के हर व्यक्ति की आवाज बनती है। संकट की घड़ी में उसकी आवाज दबनी नहीं चाहिए। पत्रकार छोटा-बड़ा नहीं होता, पत्रकार सिर्फ पत्रकार होता है।
उन्होंने अहमदाबाद के जीवराज मेहता अस्पताल में मदारी समाज द्वारा दिखाई गई सामूहिक एकजुटता का उदाहरण देते हुए कहा कि समाज के सैकड़ों लोगों ने मिलकर अपने बीमार सदस्य के इलाज का खर्च उठाया। यदि समाज की एकता से एक परिवार का संकट दूर हो सकता है। तो देशभर के पत्रकार भी अपनी सामर्थ्य के अनुसार एक-दूसरे के लिए सहयोग की मजबूत व्यवस्था खड़ी कर सकते हैं।
उन्होंने पत्रकार समाज से अपील करते हुए कहा कि राष्ट्रीय पत्रकार सुरक्षा आयोग को केवल एक संगठन नहीं, बल्कि पत्रकारों के सुख-दुःख में खड़े रहने वाले एक मजबूत परिवार के रूप में विकसित किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि आवश्यकता इस बात की है। कि किसी पत्रकार साथी पर संकट आने पर उसकी पहचान, पद, संस्थान या आर्थिक स्थिति न पूछी जाए, बल्कि सबसे पहले यह पूछा जाए। कि
हमारे पत्रकार साथी को हमारी जरूरत है। हम उसके साथ कैसे खड़े हो सकते हैं।
सुरेश कुमार शर्मा ने कहा कि यदि देश के पत्रकार एकजुट होकर अपनी सामर्थ्य के अनुसार सहयोग की भावना विकसित करें, तो बीमारी, दुर्घटना, असामयिक मृत्यु अथवा किसी अन्य संकट से जूझ रहे पत्रकार परिवारों को आर्थिक और सामाजिक सहारा दिया जा सकता है।
उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा
पत्रकारों की एकता ही उनकी सबसे बड़ी सुरक्षा है। जिस दिन देश का हर पत्रकार यह महसूस करेगा कि संकट में वह अकेला नहीं है। उसी दिन पत्रकारिता की वास्तविक शक्ति दिखाई देगी।
राष्ट्रीय पत्रकार सुरक्षा आयोग की ओर से यह संदेश अब केवल एक अपील नहीं, बल्कि पत्रकार एकता, सम्मान और मानवीय सहयोग की दिशा में एक मजबूत विचार के रूप में सामने आया है।
सुरेश कुमार शर्मा का संदेश साफ है।
कलम चलाने वाला हाथ संकट में कांपना नहीं चाहिए।
पत्रकार की आवाज समाज तक पहुंचती है।
अब समाज और पत्रकार संगठन की जिम्मेदारी है। कि संकट में पत्रकार के परिवार तक मदद पहुंचे।







