वाराणसी
वाराणसी का वह घाट, जो कभी खिड़कियां घाट के नाम से जाना जाता था, आज ‘नमो घाट’ के रूप में देश-विदेश के पर्यटकों के आकर्षण का प्रमुख केंद्र बन चुका है। यहां बना विशाल ‘नमन’ (हाथों की आकृति) लोगों के लिए खास आकर्षण है। दूर-दूर से आने वाले पर्यटक यहां तस्वीरें खिंचवाते हैं और बनारस की इस खूबसूरत पहचान को अपनी यादों में संजोकर ले जाते हैं।

लेकिन आज जब मैं वहां फोटो खिंचवा रहा था, तो एक बेहद दुखद दृश्य देखने को मिला। दीवारों पर जगह-जगह पान की पीक के निशान दिखाई दिए। थोड़ा ध्यान से देखने पर ग्रिल में बने ॐ के प्रतीक और दीवारों पर लिखे “नमो नमः” के आसपास भी पान की पीक के दाग नजर आए, जो हमारी आस्था और सार्वजनिक संपत्ति—दोनों का अपमान है।
दुर्भाग्य से दीवारों पर लगी टाइलों का रंग और पान की पीक का रंग लगभग मिलता-जुलता होने के कारण लोग बेझिझक वहीं थूक रहे हैं। इसका गलत संदेश बाहर से आने वाले पर्यटकों तक भी पहुंच रहा है और वे भी अनजाने में ऐसा करने लगते हैं।
‘नमो घाट‘ केवल एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि काशी की पहचान और हमारी सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। इसलिए प्रशासन को यहां नियमित सफाई, थूकने पर सख्त जुर्माना और जागरूकता संबंधी बोर्ड लगाने जैसे प्रभावी कदम उठाने चाहिए। साथ ही हम सभी नागरिकों का भी कर्तव्य है कि सार्वजनिक स्थलों को स्वच्छ रखें और अपनी सांस्कृतिक धरोहर का सम्मान करें।
रिपोर्ट – अनिकेत शर्मा







